Friday, May 29, 2020

ऐसा क्यों

आज रवि का सुबह ही फोन आ गया था।वैसे तो लता जी नियम से हर शनिवार को बेटे को स्वयं फोन कर लेती थीं, बेटियों से तो लगभग रोज ही बात हो जाती थी।तबियत वगैरह पूछने के बाद रवि फोन रखते समय जब कहता कि मम्मी अपना ख्याल रखिएगा तो उसके शब्दों में छिपी पीड़ा और आर्द्रता वे बखूबी महसूस करती थीं, हंसकर कहतीं चिंता मत करो मैं बिल्कुल ठीक हूं, तुम भी अपना ध्यान रखना।
   यही रवि था, जब एक लड़की के पिता ने पूछ लिया था कि आपने अभी मकान नहीं बनवाया है तो रिटायरमेंट के बाद कहां रहेंगे तो नाराज होकर बोला था कि ये कोई पूछने की बात है, अपने बेटे के साथ रहेंगे और कहीं क्यों रहेंगे।
   रवि ने अपने लिए लड़की पसन्द करने की जिम्मेदारी मां को ही सौंप दिया था।लता जी ने पढ़ी लिखी एवं अच्छे परिवार की दीप्ति से बिना लेन देन के रवि का विवाह किया।समय बीतता रहा।कभी कभी रवि की बातों से लगता कि दीप्ति ससुराल पक्ष से सम्बंध नहीं रखना चाहती, परन्तु वे रवि को और खुद को भी समझा देतीं।
  रिटायरमेंट के बाद रवि के पिता जी ने बड़े शौक से मकान बनवाया परन्तु मात्र दो वर्ष बाद ही स्वर्ग सिधार गए।बेटे ने साथ चलने की जिद की परन्तु वे जाने को तैयार नहीं हुईं।डेढ़ साल बाद एक बार उनकी तबियत काफी खराब हो गई तब रवि अपने साथ ले गया।तभी चार पांच माह वे रहीं बेटे बहू के पास।आज भी उन दिनों की कड़वी यादें उनकी आंखों में आंसू ले आते हैं।
   रवि तो सुबह ऑफिस चला जाता, शाम7-8 बजे तक वापस आता।पूरे दिन में एक बार भी दीप्ति उन्हें देखने नहीं आती।खाना बनाने वाली खाना बना कर रख जाती, वे जैसे तैसे उठकर खाना ले लेतीं।वे शुगर की मरीज़ हैं, उन्हें बीच बीच में कुछ फल इत्यादि चाहिए होता था।दीप्ति को उनका किचन में जाना भी बर्दाश्त नहीं था।रवि जब पूछता कि फल दूध मम्मी को नियमित देती रहना तो हां कर देती, फिर उसके जाने के बाद मायके फोन कर उन्हें सुनाती कि उन्हें हर समय कुछ कहने खाने को चाहिए। बच्चों को भी उनके पास नहीं आने देती।अक्सर उनका शुगर लो हो जाता।रवि परेशान हो गया कि यहां आने के बाद मां इतनी कमजोर क्यों होती जा रही है।वे शिकायत कर बेटे की गृहस्थी में परेशानी नहीं पैदा करना चाहती थीं।
   उन्हें अपमानित करने का मौका निकालती रहती थी।एकबार मायके वाले आए हुए थे, कई पकवान बनवाए थे,परन्तु उन्हें बीमारी के नाम पर सुखी रोटी सब्जी दे दिया।एक बार तो हद ही हो गई।छोटे बच्चे ने कमरे में पानी गिरा दिया, उन्होंने पोछने को कहा तो अनसुना कर दिया।फिर वे पोंछा लाने के लिए जाने लगीं तो फ़िसल कर गिर गईं, वे वहीं बेहोश हो गईं।दोपहर में जब काम वाली लड़की आई तो उसने उन्हें सहारा देकर बिस्तर पर लिटाया।खैर जैसे तैसे ठीक होते ही उन्होंने वापस लौटने का फैसला कर लिया।और फिर हाथ पैर चलने तक अपने घर पर ही रहने का ठान लिया।साल दो साल में रवि अकेले आकर मिल जाता।पिछली बार आया था जाड़ों में अचानक तो वे आश्चर्य चकित रह गईं।एक दिन काफी अपसेट था तो पूछने पर फूट पड़ा कि आप क्या सोचती हैं कि आप नहीं बताती हैं तो मुझे दीप्ति के व्यवहार का पता नहीं है।मैं कितना दुर्भाग्यशाली हूं कि अपने माँ की सेवा नहीं कर सकता।लताजी स्वयं को अपराधी मानती हैं कि वे सही चुनाव नहीं कर सकीं।
   जिंदगी की कहानियां अजीब हैं, कहीं बहू, कहीं सास,नन्द,कहीं बेटा बेटी, पति पत्नी हर रिश्ते में कुछ न कुछ परेशानियां आती ही रहती हैं।ऐसा क्यों होता है।

Thursday, May 28, 2020

सौदा किस्मत का


दीप एवं अनीता का अरेंज मैरिज हुआ था।दीप के माता-पिता अपनी पसंद से अनीता को बहू बनाकर लाए थे, उसे अपने माँ पिता के पसंद पर पूर्ण विश्वास था।दीप भी अनीता के सौंदर्य एवं प्रेमपूर्ण व्यवहार से मन्त्र मुग्ध हो गया था।।वह अपने माँ पिता की इकलौती सन्तान था, उसे चिंता रहती थी कि कहीं उसकी पत्नी का सामंजस्य उसके माता पिता से न बैठ सका तो क्या होगा।लेकिन अनिता ने अपने मधुर व्यवहार से उनके हृदय में बेटी की जगह बना लिया।दीप अपने पिताजी के व्यवसाय को और अधिक उन्नति के पथ पर ले गया।ईश्वर की कृपा से घर में हर तरह से सुख-समृद्धि-शान्ति थी।
   पर समय सदैव एक समान नहीं रहता।दो वर्ष तो पंख लगाकर उड़ गए।अब सभी एक नन्हे मेहमान की प्रतीक्षा करने लगे थे।विलम्ब होते देख चिकित्सा के लिए डॉक्टर के पास जाने पर तमाम तरह की जांच होने पर पता चला कि अनीता के गर्भाशय में एक छोटा सा ट्यूमर है ट्यूमर कैंसरस नहीं था इसलिए चिंता की बात नहीं थी।दवाइयां प्रारंभ हो गईं।दीप ने अपने माता पिता से इस बात का ज़िक्र नहीं किया।इलाज चलते चलते डेढ़ वर्ष और बीत गए।अब दोनों के मन में निराशा घर करने लगी थी, ट्यूमर न घट रहा था, न बढ़ रहा था।इसी बीच अनीता प्रेग्नेंट हो गई डॉक्टर ने कहा कि यदि ट्यूमर का आकार न बढ़े तब तो कोई बात नहीं।नियमित चेकअप चलता रहा।
   लेकिन किस्मत के तो खेल ही निराले हैं, सब कुछ अच्छा चलते चलते ऐसी ठोकर दे देता है कि सम्भलना मुश्किल हो जाता है।बच्चे के साथ साथ चौथे माह से ट्यूमर का आकार भी बढ़ने लगा,कंचे के आकार से बढ़कर बेर के बराबर हो गया।हालांकि बच्चे का विकास सामान्य था।पांचवां महीना बीतते बीतते ट्यूमर सेब के बराबर हो गया।अब डॉ ने चिंता जताते हुए कहा कि ट्यूमर पर बढ़ते बच्चे का दबाव पड़ने से ट्यूमर के साइड वाली दीवार पतली हो गई है, अतः प्रेग्नेंसी आगे जारी रखना खतरनाक हो सकता है।
   अचानक उनकी खुशियां उनसे दूर जाती प्रतीत होने लगीं।अनीता किसी भी हालत में अपने बच्चे को खोना नहीं चाहती थी।दुखी तो दीप भी बहुत था परंतु अजन्मे बच्चे के मोह में वह अनीता को दावँ पर लगाने को हर्गिज तैयार नहीं था।दोनों को तनाव में देखकर मां पिता भी परेशान थे, परन्तु बार बार पूछने पर भी दीप-अनीता ने उन्हें कुछ नहीं बताया क्योंकि वे उन्हें दुःखी नहीं करना चाहते थे।देखते देखते छठा माह बीतने को आया।स्थिति की गम्भीरता को देखते हुए अब हर सप्ताह चेकअप होने लगा था।एक दिन अचानक अनीता के पेट में दर्द प्रारंभ हो गया।आनन फानन में अस्पताल ले जाया गया।चेकअप होने पर पता चला कि ट्यूमर वाली दीवार अत्यधिक पतली हो चुकी है एवं कभी भी फट सकती है।अब डॉ ने स्पष्ट कह दिया कि यदि अनीता की जान बचानी है तो तुरंत ऑपरेशन कर के बच्चे को निकालना होगा।अब दीप के माता पिता को भी सारी बात पता चली, वे दीप पर नाराज होने लगे कि उन्हें पहले सारी बात क्यों नहीं बताया गया।उन्होंने दृढ़ता से कहा कि उनके लिए अनीता की जिंदगी ज्यादा महत्वपूर्ण है, यह निर्णय लेने में इतना विलम्ब होना ही नहीं चाहिए था।
   खैर, ऑपरेशन कर बच्चे को इनक्यूबेटर में रखकर बचाने का प्रयास किया गया, परन्तु उसे बचाया नहीं जा सका।सभी बेहद दुखी थे, किन्तु किस्मत के आगे किसका वश चलता है।दीप ने किस्मत से सौदा कर अनिता को चुन लिया बच्चे के बदले में।
   अनीता को उस सदमें से उबरने में सबने हर सम्भव प्रयास किया।अनीता के पास असीम प्यार करने वाला परिवार था, पर गोद सूनी ही रह गई।
   अजीब है भाग्य का चलन,बहुत कुछ देकर भी एक ऐसी रिक्ति छोड़ देता है, जिसकी भरपाई किसी भी तरह नहीं हो पाती।


Tuesday, May 26, 2020

हमारे आसपास जिंदगी में तमाम कहानियां होती हैं, खट्टी मीठी, तीखी, कड़वी, अच्छी, बुरी।कुछ आपसे बांटना चाहती हूँ, कुछ मन में घुमड़ते भावों को कहना चाहती हूं।किसी को कुछ बुरा लगे तो क्षमाप्रार्थी हूँ।
   हर जिंदगी में इतनी कहानियां समाहित हैं कि एक उपन्यास बन जाए,बस उन्हें शब्दों में बांधने की कला आनी चाहिए, साहित्यकार यही तो करते हैं।मैं लेखिका नहीं एक आम गरी

Saturday, May 23, 2020

न्याय

   न्याय,
कभी घुटने टेक देता है धन के समक्ष,
कभी दबा दिया जाता है बाहुबली द्वारा,
कभी छिप जाता है झूठ के धुंध में,
कभी जकड़ जाता है कुटिल शब्द जाल में,
गरीब की पहुंच से सर्वदा सुदूर,
कभी सबूतों के अभाव में मजबूर,
न्याय की देवी खड़ी है कटघरे में,
आँखों में आँसू भरे,पट्टी बांधकर।।

Thursday, May 21, 2020

मेरी खामोशी

खामोशी गुनगुनाती है, मुस्कराती है,
दुःख में संग आँसू भी बहाती है,
यादों की गलियों में विचरती हूँ,
मन के भावों को शब्दों में संजोती हूँ,
न बातें बनने-बिगड़ने का डर,
न अकेलेपन से उपजे अवसाद का ख़ौफ़,
शोर से दूर सुकून के पल बिताती हूँ,
भूल चुकी थी ,स्वयं को तलाशती हूँ,
मेरे साथ मेरी खामोशी खिलखिलाती है।
मेरी खामोशी गुनगुनाती है, मुस्कराती है।।
                     मेरी खामोशी।।