Tuesday, August 11, 2020

Tufan ke bad

   इंसान की फितरत होती है जब तक चोट नहीं खाता, तब तक वह न समझना चाहता है, न सम्भलना।और जब समझ आता है तो सब कुछ बर्बाद हो हाथ से निकल चुका होता है।

   यही हुआ था अमित के साथ।अच्छा प्यारा सा हंसता खेलता परिवार था उसका, अच्छी सी पत्नी, दो प्यारे बच्चे, एक बेटा एवं एक बेटी।मां-पिता के साथ रहते थे वे, क्योंकि पास के शहर में ही वह एक प्राइवेट फेक्ट्री में सुपरवाइजर था,दो घंटे की दूरी थी,शनिवार को आ जाता एवं सोमवार की सुबह लौट जाता।पिता बड़े पद वाले सरकारी नौकरी से रिटायर हुए थे, अतः बड़ा सा मकान बनवा लिया था, दो हिस्से में किराएदार थे,एक में वे रहते थे।मकान मुख्य सड़क पर था अतः 4 दुकानें किराए पर उठी हुई थीं।

   बड़ी विवाहिता बहन थी,जो तीज त्योहारों पर आ जाती थी।घर में शुरू से मां का वर्चस्व रहा था, विवाह के बाद आम युवती की भांति उसकी पत्नी नीता भी पति के साथ अकेले रहना चाहती थी किन्तु मां ने स्पष्ट रूप से साथ भेजने से मना कर दिया था कि पास में ही तो जॉब है, यहां इतना बड़ा घर है, किराए में पैसे बर्बाद करने की जरूरत नहीं है।चाहता तो अमित भी था किंतु मां का विरोध करने का साहस उनमें नहीं था, अतः मन मारकर उन्होंने समझौता कर लिया था।

   बीतते समय के साथ दो बच्चे उनकी जिंदगी में शामिल हो गए।इधर अकेले रहते हुए दोस्तों के सोहबत में अमित को शराब पीने की आदत पड़ गई, जो कभी कभी से रोजाना में बदल गई।एक बुरी आदत अपने संग और बुराइयों को जोड़ लेती है।एक बार दोस्तों के उकसाने पर रेड लाइट एरिया में भी हो आया।इन सबका परिणाम यह हुआ कि जहां हर शनिवार को घर भागने की पड़ती थी, अब वह दोस्तों की महफ़िल में गुजरती थी।नीता, मां-पिता से ओवर ड्यूटी का बहाना बना देता।

   पति की बढ़ती दूरी से नीता परेशान रहने लगी।मुस्कुरा कर हर जिम्मेदारी निभाने वाली नीता चिड़चिड़ी होती जा रही थी।उसे भय सताने लगा था कि अमित कहीं किसी अन्य स्त्री के चक्कर में तो नहीं पड़ गया है।परिणामस्वरूप अक्सर उनके मध्य फोन पर भी विवाद हो जाता था, जब अमित घर आता तो बार बार कम आने का कारण पूछती,और अन्ततः झगड़ा बढ़ जाता।सास भी सदैव नीता को ही भला-बुरा कहतीं।बच्चे भी सहमे से रहते थे।अमित को बाहर की दुनिया इतनी रास आ गई थी, घर में मन ही नहीं लगता था।

   जब पिछली बार अमित घर आया तो विवाद होने पर शराब के नशे में नीता की बुरी तरह पिटाई कर दी, क्रोध और अपमान से तिलमिलाई नीता ने कहा कि यदि ऐसा ही चलता रहा तो वह आत्महत्या कर लेगी।थोड़ी देर रोने धोने के बाद वह शांत हो गई।लेकिन एक बार हाथ उठाने के बाद अमित शेर हो गया, अब उसने नीता को नियंत्रित करने का यह तरीका अपना लिया।

   सही कहा गया है विनाश काले विपरीत बुद्धि।इस बार की लड़ाई में अमित ने कह दिया कि केवल मरने की धमकी देती हो मर क्यों नहीं जाती।क्रोध के आवेग में नीता ने चूहे मारने की दवा खा लिया।आनन फानन में हॉस्पिटल ले जाया गया, त्वरित चिकित्सा सुविधा मिलने के कारण जान तो बच गई, लेकिन नीता होश में नहीं आई,वह कोमा में चली गई।एक माह बाद डॉक्टरों ने घर भेज दिया क्योंकि कोमा में जाने पर कब वापस आए मरीज पता नहीं होता।अब नीता न जिंदा थी,न मृत्यु को प्राप्त होकर मुक्ति प्राप्त कर सकी।

   आत्महत्या के मामले को दबाने में लाखों रुपए खर्च हो गए।हॉस्पिटल में एक माह का लाखों का बिल बना।नीता की देखभाल के लिए एक फुल टाइम की नर्स रखनी पड़ी।फिर भी अमित को घर पर ही रहना पड़ा देखरेख के लिए, परिणामतः नोकरी भी जाती रही।पिता के पेंशन एवं मकान दुकान के किराए से घर तो जैसे तैसे चल जाता था, किन्तु समाज में भी अच्छी-खासी बदनामी हो गई थी।

   जमां पूंजी समाप्त हो गई थी।घर में जहां खुशियों का डेरा था, मनहुंसियत ने स्थाई घर बना लिया था।देखते देखते एक बसा हुआ परिवार उजड़ गया, शेष रह गया तूफान गुजरने के बाद कि बर्बादी।

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Saturday, July 25, 2020

Tark se pare-vah anubhav


तर्क से परे-वह अनुभव
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द्वितीय कथा
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     दो ध्रुव सत्य हैं संसार के, जीवन और मरण।आत्मा पंचतत्वों से निर्मित शरीर में प्रवेश कर माता के गर्भमाध्यम से इस नश्वर संसार मे अवतरित होती है, फिर जीवन काल पूर्ण कर इस शरीर को जीर्ण वस्त्र की भांति  त्यागकर  पुनः अगले जीवन चक्र में प्रवेश कर जाती है।
   वेद-पुराणों में वर्णित तमाम तथ्यों की विवेचना बुद्धि-सामर्थ्य मुझमें नहीं है, परन्तु जीवन में अनेकों ऐसी घटनाएं हमारे आसपास घटित होती हैं जो हमें सोचने पर विवश करती हैं कि कुछ तो ऐसा है जो तर्क से परे है।
   मेरे ससुर जी का देहांत मेरे विवाह से कई वर्ष पूर्व हो चुका था।वे अपने प्रथम पुत्र अर्थात मेरे पति के अत्यंत निकट थे, क्योंकि कई पुत्रियों के बाद उनका जन्म हुआ था।उस काल में लोगों के मन में शिद्दत से यह भावना स्थापित थी कि पुत्र के द्वारा किए गए तर्पण के बिना सद्गति प्राप्त होना असंभव है, और वंश संचालन पुत्र के द्वारा ही होता है।हालांकि आज भी ज्यादातर लोग इस मनोवृत्ति से उबर नहीं सके हैं।
   हमारे विवाह के लगभग दो साल बाद की बात है, उस रात्रि मैंने स्वप्न में अपने ससुर जी को देखा, चरणस्पर्श करने पर उन्होंने मुझे आशीष देते हुए कहा कि मैं तुम लोगों के पास आने वाला हूं।सुबह जब मैंने अपने पति से इस सपने का ज़िक्र किया तो उन्होंने हँस कर टाल दिया कि तुम न जाने क्या क्या देखती रहती हो
मैं बताती चलूं कि रात्रि शयन  में देखे हुए ज्यादातर स्वप्न जागने पर अच्छी तरह याद रहते हैं।कभी कभी तो नींद टूटने पर वही बाधित स्वप्न पुनः सोने पर फ़िल्म की तरह कंटीन्यू हो जाता है।
   हमारा बेडरूम नीचे था, नीचे ही मेरे पति की क्लीनिक थी,किचन, सासुमां एवं देवर का कमरा ऊपरी मंजिल पर था।किचन के कार्य से निबट कर दोपहर में 2-3 घण्टे आराम करने के लिए मैं अपने कमरे में चली आती थी।
   मुझे तीन माह की प्रेगनेंसी थी।गर्भावस्था के प्रारंभिक दिनों में तमाम परेशानियां इतनी अधिक होती हैं कि शरीरिक कमजोरी के साथ बेचैनी भी अत्यधिक रहती थी, अतः नींद तो आती नहीं थी, तो समय व्यतीत करने के लिए लेटे लेटे स्वयं के साथ ही कभी अंताक्षरी खेलती थी,कभी चालीसा का पाठ करती थी।
   वह 29 सितम्बर की दोपहरी थी।मैं कमरे में आंख बंद कर आराम कर रही थी।खिड़की से आती रोशनी से कमरे में विशेष अंधेरा नहीं था।मुझे ऐसा प्रतीत हुआ कि कमरे में कोई आया है, आँखे खोलकर देखा तो कोई नहीं था।मैंने सोचा कि मेरे पति आए होंगे।समय देखा तो 2.35 हो रहे थे।मैंने पुनः आंखे बन्दकर लिया।कुछ देर बाद मुझे पुनः किसी की उपस्थिति का आभास हुआ, इस बार भी कमरे में किसी को न पाकर मैंने बाहर निकल कर देखा कि शायद पति गोदाम में से दवा निकालने गए हों, जब उन्हें वहां भी नहीं पाया तो क्लीनिक में चली गयी, देखा तो वे ध्यानमग्न अपनी कुर्सी पर बैठे हुए हैं।मैंने उन्हें आवाज देकर बुलाया और सारी बात बताते हुए पूछा कि अभी आधा घंटे के अंदर आप आए थे क्या कमरे में।
   उन्होंने बताया कि वे तो लगभग दो घंटे से यहीं कुर्सी पर ही बैठे हुए हैं, फिर अंदर आकर सब जगह अच्छी तरह चेक किया।फिर मुझसे समय पूछा तो मैंने बताया कि 2.35 से 2.55 के बीच में  मुझे 2-3 बार ऐसा लगा कि कोई कमरे में आया है।पहले तो उन्होंने कहा कि तुम्हें झपकी आ गई होगी, जिससे तंद्रावस्था में तुम्हें भ्रम हुआ होगा।मैंने कहा कि मैंने हर बार समय देखा था।
   फिर उन्होंने मुझसे पूछा कि तुम्हें कुछ याद है कि आज तिथि कौन सी है।मेरे इनकार करने पर बताया कि आज ही के दिन दोपहर ही में इसी समय पिता जी का स्वर्गवास हुआ था।इसी कमरे में उनका शयनकक्ष था।उस दिन तो मेरे पति पूरी दोपहर मेरे साथ रहे, हालांकि फिर आगे मुझे कभी ऐसा कोई अनुभव नहीं हुआ।मुझे पूरा विश्वास था कि मुझे बेटा होगा क्योंकि मुझे अपने स्वप्न पर पूर्ण विश्वास था
   डिलीवरी तिथि के एक माह पूर्व मैं अपने मायके चली गयी।नियत समय पर सिजेरियन ऑपरेशन द्वारा मैंने एक अत्यंत स्वस्थ बालक को जन्म दिया, अत्यंत काले बाल थे उसके।
   नहीं जानती कि इन तथ्यों की क्या वास्तविकता है, किन्तु मान्यता यही है कि कभी कभी जीवात्मा मनोवांछित गर्भ की तलाश वर्षों तक करती रहती है।कुछ ऐसा ही विश्वास मेरा था कि मेरे ससुर जी ने ही अपने प्रिय बेटे के यहां पुत्र रूप में पदार्पण किया है।यह भी एक अद्भुत संयोग था कि मेरे बेटे को जैसे सोने से डर लगता था, जब उसे नींद आती थी तो बुरी तरह रोता था, मैं एवं मेरी माँ घबरा जाते थे कि न जाने उसे क्या तकलीफ है।उसकी यह स्थिति डेढ़ दो साल तक रही।मेरे ससुर जी सोते समय ही स्वर्ग सिधार गए थे, शाम को जब वे नहीं उठे तब पता चला था, जबकि पास में ही सासुमां पेपर पढ़ रही थीं।
   दूसरी बात तो बस यूं ही है।मैंने अपने दोनों विगत अनुभव अपनी मां को बता रखे थे।हॉस्पिटल से लौटने के 8-10 दिनों बाद एक दिन बेटे की मालिश मां कर रही थीं, मां ने हँसते हुए कहा कि क्यों समधी जी,समधिन से मालिश करवाना कैसा लग रहा है।बेटा खिलखिला कर हंस पड़ा।हमने प्रथम बार 10-12 दिन के बच्चे को इतनी जोर से खिलखिलाते हुए देखा था, सोते समय तो बच्चे अक्सर मुस्कुराते हैं।फिर 3-4बार मम्मी ने पुनः उक्त कथन को दोहराया, और बेटा हर बार जोरों से खिलखिला पड़ता था।फिर तो यह हमारा रोज का कार्य हो गया।न जाने यह क्या इत्तेफाक था कि और किसी बात पर न मुस्कुराए,परन्तु उस कथन पर अवश्य हंसता था।
   खैर, ईश्वर की अनन्त माया को वही जाने।हम तो साधारण मनुष्य मात्र हैं, उसके इशारों पर कठपुतली की तरह जीवन व्यतीत करते चले जाते हैं।
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   पुनः एक नई कथा के साथ उपस्थित होती हूं।
(प्रथम कथा था-पुनर्जन्म)


Friday, July 10, 2020

युवा

माथे पर बिखरी लापरवाह सी लट,
होठों पर फैली बेपरवाह सी हंसी,
मुड़ी-तुड़ी टी शर्ट, कटी फ़टी जींस,
कानों में लगी या गले में लटकी लीड,
मोबाइल पर तेजी से फिसलती उंगलियां,
भले ही आज का युवा रहता है यूं,
पर वो संजीदा भी है, समझदार भी,
अपने सपनों के लिए बेहद जुनूनी,
नहीं करता विश्वास औपचारिकताओं में,
पर नहीं रहता पीछे मदद करने में,
दे देता है सीट किसी वृद्ध को,
जीना जानता है जिंदगी को बिंदास।
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Wednesday, July 8, 2020

प्रीत राग

घुल गई है नफरत बहुत फिजाओं में,
चलो मिलकर सब प्रीत राग गाते हैं।
जिंदगी सहमी सी दुबकी हुई है कोनों में,
रौशनी करने को मिल दीप सब जलाते हैं।
जमीं पर आसमानी फ़रिश्ते नहीं उतरा करते,
बचाए जिंदगी वही मसीहा कहलाते हैं।
तनहा बैठे हुए हैं हम सब घरों में अपने,
खिड़की से झांक चलो हाल पूछ आते हैं।
हर चेहरे पर छाई हुई है मायूसी,
तमाम ख़ौफ़ को हिम्मत से हम मिटाते हैं।
खताएँ इतनी भी मत करो के मुआफ़ी न मिले,
गलती हद से बढ़े तो गुनाह ही कहलाते हैं।

Friday, July 3, 2020

सुखान्त


वैसे तो कुछ न कुछ अनहोनी होती ही रहती है, परन्तु 2020 में विश्वव्यापी कोरोना महा आपदा ने जो त्राहि त्राहि मचाया, उसने जीवन की रूप रेखा ही बदल दी।कटु सत्य तो यही है कि आगे क्या होगा कल्पना से परे है, परन्तु आशा पर दुनिया टिकी है, इसलिए मैं उम्मीद की एक कहानी लिखना चाहती हूं।
    मेरा बेटा दिल्ली में एक बड़े हॉस्पिटल में दो वर्ष से चिकित्सक है।अपने साथ कार्यरत डॉ लड़की से उसका परिचय कुछ समय में प्रेम में परिवर्तित हो गया।मिलने पर हमें भी वह कन्या अपने बेटे के लिए पूर्ण रूप से उपयुक्त प्रतीत हुई।दोनों पक्षों में वर्तालाप के उपरांत 25 मई को विवाह करने का निर्णय लिया गया।दोनों पक्षों में प्रथम समारोह था, इसलिए हम सब उत्साह से तैयारी में जुट गए।अभी तैयारी प्रथम चरण में ही थी कि कोरोना आपदा के आ जाने से लॉक डाउन प्रारम्भ हो गया।जीवन रक्षा में खाकी एवं श्वेत वर्दी के लोग प्राण प्रण से जुट गए।मेरे बेटे के हॉस्पिटल में भी कोरोना चिकित्सा की व्यवस्था थी।चिकित्सा करते करते मेरा बेटा भी कोरोना पॉजिटिव हो गया।लेकिन सकारात्मक सोच एवं समुचित चिकित्सा से जल्दी ही ठीक होकर पुनः अपने कार्य में जुट गया।
हमारे सलाह से विवाह की बजाय 25 मई को सहयोगियों के समक्ष उन्होंने सगाई कर ली।इस कठिन दौर में एक छोटी सी खुशी भी एक नए ऊर्जा का संचार कर देती है जीवन में।अगस्त बीत गया है, वेक्सीन का ट्रायल मरीजों पर प्रारंभ किया जा चुका है, परिणाम अपेक्षित प्राप्त हो रहे हैं।लॉक डाउन तमाम सावधानियों के साथ खुल चुका है।प्रयाप्त सुरक्षा उपायों के साथ ट्रेन, बस,वायु सेवा प्रारंभ हो गई है।लोग सोशल डिस्टेंसिंग, मास्क का उपयोग, सफाई,इत्यादि समस्त सुरक्षा उपायों को जीवन पद्धति में शामिल कर चुके हैं।दिवाली आने वाली है, उसके साथ साथ एक बड़ी खुशखबरी आई है कि भारत में कोरोना की वेक्सीन पूर्णतया सफल रही है।काफी लोगों में तो स्वयं ही इम्यूनिटी डेवलप हो चुकी है, जल्दी ही सभी को वैक्सीन उपलब्ध हो जाएगा।
  दिसम्बर के अंतिम सप्ताह में सादगी से हमारे बेटे का विवाह संपन्न हो गया।इतने कठिन परिस्थितियों से गुजर कर हम बाहर आए हैं।दोनों परिवार मिलकर एक साथ वैष्णो देवी मां के दर्शन को जा रहे हैं,2020 को विदा करते हुए नए आशाओं के साथ नव वर्ष का स्वागत करने।नव युगल वहीं से दूसरी जगह चले जाएंगे और हम वापस अपने घरों को।

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Wednesday, July 1, 2020

मेरी बात

सही गलतकी परिभाषा भी समय, वय,परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तित होती रहती है एवं उनको समझाने, सिखाने का तरीका भी।जब बच्चे छोटे होते हैं तो हमें निर्णय लेकर बच्चों से उनका पालन करवाना होता है जो आसान होता है।तब मेरा बेटा नर्सरी में था, पास में ही स्कूल होने के कारण मैं पैदल ही लेकर आती थी।दुकानों पर विभिन्न वस्तुओं को देखकर बच्चे लेने की जिद तो करते ही हैं, मैने एक दिन छोड़कर 5 रु की वस्तु दिलाने का वादा कर रखा था।एक बार दूसरे दिन भी जिद करने लगा,वह रोता रहा किन्तु मैं घर ले आई बिना दिलाए।छोटी सी बात थी परंतु इच्छाओं पर नियंत्रण सीखना ही चाहिए, फिर बच्चों को यह पता होना चाहिये कि जिद सही बात के लिए होनी चाहिए।
सबसे मुश्किल होता है किशोरवय के बच्चों को कुछ समझाना क्योंकि इस दौर में तमाम शरीरिक ,हार्मोनल परिवर्तनों के कारण वे अत्यंत अस्थिर होते हैं, उनके ऊपर उनके दोस्तों का अत्यधिक प्रभाव होता है,माता पिता से विचारों में मतभेद प्रारम्भ हो जाता है, इसलिए हर बात पर वे टोकने पर विद्रोही होने लगते हैं, अतः उनकी बातों को ध्यान से सुन समझ कर धैर्य से उचित अनुचित समझाने की आवश्यकता होती है।
युवा होते बच्चों से मित्रवत व्यवहार की जरूरत होती है जिससे वे अपनी किसी भी समस्या को आसानी से डिस्कस कर सकें।युवा एवं पिछली पीढ़ी के मध्य अंतराल तो शाश्वत है, अतः हमें उनके दृषिटकोण को भी समझना होगा एव उन्हें हमारे अनुभवों से सीख लेना चाहिए।बहुत से लोग अपने बच्चों की तुलना स्वयं से तथा अन्य से करते रहते हैं यह उचित नहीं है।सदैव शक एवं अविश्वास उन्हें हमसे विलग कर देगा।
युवा बच्चों को निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र छोड़ देना चाहिए।, हां,हमें अपने विचार एक बार अवश्य व्यक्त करना चाहिए उचित तर्कों के साथ, हर पहलू पर एक स्वस्थ विचार विमर्श होना चाहिए।बड़ों के सभी निर्णय सही नहीं होते और बच्चों के सभी गलत नहीं हो सकते।कैरियर एवं विवाह मतभेद के दो अहम मुद्दे होते हैं जिनपर अत्यंत समझदारी से निर्णय लेने की आवश्यकता होती है क्योंकि यह जीवन प्रश्न होता है।अन्ततः एक ध्रुव सत्य, हमें सदैव मस्तिष्क का प्रयोग कर अच्छे के लिए
करते रहना चाहिए,परिणाम ईश्वर तथा समय के अधीन है।
शुभदिवस।

Sunday, June 28, 2020

युवा

तुम युवा भविष्य राष्ट्र के हो,
तुम्हारी असीम ऊर्जा करेगी
देश को उन्नति पथ पर अग्रसर,
ले जाएगी सर्वोच्च शिखर पर,
हम भूतकाल हैं नीव के समान,
समग्र निर्माण तुम्हारे कांधे पर,
पहचानो स्वयं की क्षमता को,
मत करो व्यर्थ अपना जीवन,
किसी भी दुर्व्यसन में,
मत लगा दो दावँ पर खुद को,
किसी असफलता के अवसाद में,
तुम अनमोल हो हमारे लिए,
जुट जाओ लक्ष्य प्राप्ति में,
बनकर स्वर्णिम हस्ताक्षर
चमको सूर्य की तरह विश्वाकाश में।

Tuesday, June 23, 2020

साथ तुम्हारे

   वैसे देखा जाय तो यह एक सामान्य सी गाथा है, परन्तु असाधारण इस सन्दर्भ में है कि हमने शून्य से प्रारंभ कर आज जीवन में उस मुकाम को हासिल कर लिया है जिसके सपने एक आम मध्यमवर्गीय इंसान सदैव देखता है।
   यदि एक समझदार एवं हर हाल में साथ देने वाला साथी  साथ में हो तो जीवन के हर संघर्ष को विजित किया जा सकता है।
   मुझे अच्छी तरह याद है वह दिन जब तुमने अत्यंत सादगी से मुझसे विवाह करने की इच्छा जताई थी।हमारे मध्य कोई प्रेम प्रसंग तो था नहीं।मैं उस समय तृतीय वर्ष में अध्ययनरत थी, एक सामान्य रंग-रूप की,मध्यम कद-काठी की युवती,छह भाई-बहनों के मध्य तीसरे नंबर की।पिता सरकारी स्कूल में प्राध्यापक थे।हम सभी भाई-बहन पढ़ने में अच्छे एवं परिश्रमी थे।मेरा चयन बीएमएस में हो गया था।मैं अल्पभाषी एवं स्पष्टवादी थी, परिणामतः मैं कभी कभी लोगों को दम्भी प्रतीत होती थी, हालांकि मेरे मन में कभी भी किसी के प्रति कोई ईर्ष्या-द्वेष नहीं रहता था।मैं इधर उधर अनावश्यक समय व्यर्थ करना पसंद नहीं करती थी, अपनी शिक्षा पर ध्यान केंद्रित रखकर अपने काम से काम रखने वाली थी।मेरा सिद्धान्त था न काहू से दोस्ती न काहू से बैर।अत्यंत रूपवती तो थी नहीं कि लोग मुझसे प्रभावित हो, न मैं इसकी आकांक्षी थी।
   आप मुझसे दो साल सीनियर थे एवं मेरी ही तरह सामान्य तथा धीर गम्भीर व्यक्ति थे,इसपर हम समान जाति, शिक्षा के थे।अतः मैंने आपके प्रस्ताव को अपने परिवार के समक्ष प्रस्तुत किया।फिर दोनों परिवारों के मध्य परस्पर वार्तालाप होने के पश्चात एक अपेक्षाकृत सादे समारोह में हमारा विवाह सम्पन्न हो गया।हालांकि आपके परिवार के लोग थोड़े अप्रसन्न थे।विरोध का कोई विशेष कारण नहीं था, परन्तु उस समय अभी भी परिवार वालों को बेटे के विवाह को बिना लेन देन के वह भी उसकी पसंद की हुई कन्या के साथ करवाना नागवार होता था।
   खैर, मैं ससुराल आ गई किन्तु कुछ ही समय में हम दोनों समझ गए कि परिवार में हमारी स्थिति ग्राह्य नहीं है।,अतः मुझे लेकर आप एक कमरे के किराए के मकान में आ गए।अभी हम दोनों की शिक्षा पूर्ण होने में समय था और हमें किसी की सहायता लेना स्वीकार नहीं था, अतः हम दोनों ने कुछ छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना प्रारंभ कर दिया।हम दोनों ही अत्यंत परिश्रमी थे।धीरे धीरे समय गुज़रता रहा।मेरी पढ़ाई पूरी होते होते हमारा बेटा हमारे घर में आ गया।यह हमारे संघर्षों का सबसे मुश्किल दौर था।
   एक छोटे बच्चे की परवरिश, साथ में घर के काम उसपर कठिन पढ़ाई,अत्यधिक मुश्किल था, परन्तु तुम पग पग पर मेरे साथ थे।हम एक दूसरे के साथी ही नहीं थे बल्कि विश्वास एवं सम्बल भी थे।
तुम्हारे सहयोगी स्वभाव ने जिंदगी की तमाम मुश्किलें आसान कर दी थीं।
   आप ग्रेजुएशन पूरा होने के बाद एमडी के लिए प्रयत्नशील थे,तभी सौभाग्य से कई प्रदेशों में मेडिकल ऑफिसर की वेकेंसी निकली एवं एक जगह आपका चयन हो गया।मेरी भी ग्रेजुएशन पूरी हो गई थी अतः हम सब आपके कार्य स्थल पर शिफ्ट हो गए।एक वर्ष बाद सौभाग्य ने पुनः हमारा साथ दिया जिससे उसी प्रदेश में मैं भी मेडिकल ऑफिसर हो गई, हालांकि हमारे कार्य स्थल के मध्य दूरी काफी थी एवं बेटा भी स्कूल जाने लगा था परंतु हमारे आपसी सहयोग से हमने अपनी सभी कठिनाइयों को जीत लिया।थोड़े बड़े होने पर हमनें बेटे को हॉस्टल में भेज दिया क्योंकि हमारे कार्यस्थल पर शिक्षा की अच्छी व्यवस्था नहीं थी।
   जिंदगी अब पटरी पर आ गई थी।ट्यूशन पढ़ाते पढ़ाते हमारी इतनी प्रेक्टिस हो चुकी थी कि अतिरिक्त समय में हमनें कोचिंग प्रारंभ कर दिया जो अब अच्छी खासी प्रसिद्ध हो गई थी।फिर वहीं हमनें अपने सपनों के घर का भी निर्माण कर लिया।।
   बेटा अत्यंत कुशाग्र बुद्धि का था अतः इंटर के तुरंत पश्चात आइआइटी में उसका सेलेक्शन हो गया।हमारी पच्चीसवीं शादी की सालगिरह बेटे ने पूरे धूमधाम से उसी शहर में सेलेब्रेट किया जहां वह शिक्षा ग्रहण कर रहा था।स्नातक पूर्ण होते ही एक अच्छी कम्पनी में उसका कैम्पस सिलेक्शन हो गया जॉब के लिए।
   ईश्वर ने चाहा तो अतिशीघ्र हम उसका विवाह उसकी पसंद की युवती से सम्पन्न कर देंगे।
   सत्य है कि उपयुक्त एवं समझदार प्रेम पूर्ण साथी साथ हो तो जीवन के कठिन से कठिन डगर को भी अत्यंत सुगमता से पार किया जा सकता है।
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Sunday, June 21, 2020

संदेश एक बेटे का

एक संदेश बेटे का पिता के नाम
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     डियर पापा,
मैं जानता हूँ कि हमारे
मध्य तमाम मतभेद हैं,
आपको कई शिकायतें हैं
कि मैं अत्यधिक लापरवाह हूँ,
फोन नहीं करता समय से,
आनाकानी करता हूँ घर आने में,
मेरी दिनचर्चा से असहमत हैं आप,
आपको प्रतीत होता है कि
आप सबसे प्रेम कम है मुझे,
मुझे भी लगता है कि आपको
 विश्वास नहीं है मुझपर,
हमारे बीच अक्सर विवाद
हो जाता है किसी बात पर,
परन्तु यह अकाट्य सत्य है
कि हम दोनों के हृदय में
असीमित प्रेम है एक-दूसरे के लिए,
पर हम दोनों कृपण हैं
अभिव्यक्त नहीं करते कभी भी,
नहीं करते औपचारिक प्रदर्शन,
पर I LOVE YOU पापा-मां,
बस इतना विश्वास दिलाता हूँ
नहीं झुकेगा आपका शीष कभी भी
मेरे किसी अशोभनीय कृत्य से,
एक दिन आप गर्व से कहेंगे
कि देखो यह मेरा बेटा है।
     दिल से आपका बेटा
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Saturday, June 20, 2020

कैसा विकास

यह कैसी उन्नति, कैसा विकास,
हो रहा निरन्तर मानवीय संवेदनाओं का ह्रास,
कोई दुर्घटनाग्रस्त गिन रहा अंतिम श्वास,
लोग मदद की बजाय ले रहे तस्वीर
कहीं कर रहे किसी की बेबसी का उपहास,
कभी छुद्र स्वार्थवश खंडित करते हैं विश्वास,
हे मानव रखो हृदय में दया, प्रेम का वास,
ले जाएगा काल एक दिन बांध के यमपाश।

Thursday, June 18, 2020

श्रद्धांजलि

मेरी श्रद्धांजलि उन शहीदों को,
जो बलिदान हो गए देश की रक्षा में,
शत-शत नमन उनके परिजनों को
जिन्होंने अर्पित कर दिया जन्मभूमि पर
अपने पुत्र-पौत्र-भाई-पिता,
मेरे अश्रु उन पत्नियों के लिए
जिन्होंने न्यौछावर कर दिए
अपने सारे सपने, खुशियां,
अपनी जिंदगी के हर रंग
मातृभूमि पर सिंदूर के संग।

Wednesday, June 17, 2020

शुभ-विवाह

   मैं एक नवविवाहिता हूं, अभी 20 दिन पूर्व ही मेरा विवाह हुआ है।मैंने भी एक आम युवती की तरह सपने देख रखे थे अपने विवाह समारोह के, भव्य तो नहीं, परन्तु पूरे रस्म-रिवाज को निभाते, सखियों-रिश्तेदारों से घिरी, हंसी-ठिठोली के बीच।किन्तु आज के विषम परिस्थितियों के कारण तमाम सावधानियों के साथ गिनती के परिजनों के मध्य अत्यंत सादे आयोजन में विवाह संपन्न हो गया।
   याद आ रही है सात साल पहले बड़ी दीदी के विवाहोत्सव की। घर में प्रथम विवाह में छोटे भाई बहनों में उत्साह भी अत्यधिक होता है।एक माह पूर्व ही कपड़े एवं अन्य आवश्यक सामानों की खरीदारी प्रारम्भ हो गई थी।तीन चार दिन पहले ही रिश्तेदार घर में आ गए थे।रोज रात में ढोलक की थाप पर शगुन गीत गाए जाते थे।दो दिन पूर्व लेडीज संगीत में पूरे महल्ले की महिलाओं ने इकट्ठा होकर जबरदस्त महफ़िल जमा दिया था।उसी दिन भात पहनाने का कार्यक्रम भी सम्पन्न हुआ था।विवाह बेंक़वेट हॉल से था, सुबह से ही भागा दौड़ी शुरू हो गई थी।रात में दीदी ब्यूटी पार्लर से तैयार होकर आई थी एवं हम सब बहनों-सहेलियों ने पूरे साज श्रृंगार में, खूब चुहलबाजी करते हुए समारोह में शामिल हुए।रिवाल्विंग स्टेज पर जयमाला हुई।ढेर सारे बाराती-घराती ने दावत का आनन्द लिया।
   मेरे लिए वैसे तो 3-4 वर्ष से वर की खोज परिवार वाले कर रहे थे, परन्तु अब सुयोग बन पाया था।अब सभी लोग ज्यादा विलम्ब नहीं करना चाहते थे क्योंकि कोरोना समस्या से निकट भविष्य में निजात पाने की सम्भावना दिखाई नहीं दे रही थी।समारोह में मात्र 30 लोगों के शामिल होने की इजाजत प्रशासन ने प्रदान किया था।20 लोग वर पक्ष के एवं 10 कन्या पक्ष के आपसी सहमति से  निर्धारित कर लिया गया।
   विवाह से एक दिन पूर्व बड़ी छोटी बहनों एवं पड़ोस की एक दो आंटी की उपस्थिति में तेल-मेंहदी, शगुन, संगीत इत्यादि की औपचारिकताएं पूरी कर दी गई।
   विवाह वाले दिन घर की छत पर टेंट लगाकर लोगों के बैठने-खाने की व्यवस्था कर दी गई।मायके पक्ष के जो5-6 रिश्तेदार थे उन्होंने पहले ही खाने की मनाही कर दी थी।ससुराल लोकल में ही है, अतः बाराती घर से ही तैयार होकर 12 बजे तक आ गए।न द्वारचार, न बेंड,न नाच गाना, न रोशनी क्योंकि दिन की शादी थी।गेट पर ही सभी को सेनिटाइज कर छत पर पहुंचा दिया गया, सभी के चेहरों पर मास्क बंधे हुए थे।छत पर ही जयमाल का कार्यक्रम सम्पूर्ण हुआ।जयमाल के बाद फोटो खिंचवाने के लिए जरूर थोड़ी देर के लिए सबने मास्क हटा दिया था।उसके बाद बरातियों ने खाना खाया।फिर विवाह की रस्में पूरी करा दी गईं।मेकअप भी बहनों ने ही कर दिया था।फिर देर शाम को हल्का फुल्का नाश्ता करके बारात एवं मैं विदा हो गई।
   ससुराल पहुंचते रात हो गई थी अतः मुंहदिखाई एवं अन्य रस्मों की औपचारिकता दूसरे दिन होनी थी।खैर गिनती के ही रिश्तेदार ससुराल में भी थे,दूसरे दिन शीघ्र ही समस्त कार्यक्रम पूर्ण हो गए।इस समय तो हनीमून पर जाने का तो प्रश्न ही नहीं था।5-6 दिन बाद ही मुझे पति के साथ भेज दिया गया।
   खैर, भविष्य के लिए हम योजनाएं तो बनाते ही हैं, उसमें क्या पूर्ण होता है क्या अधूरा रह जाता है, समय के हाथ में है, यही जिंदगी है।हम सब इसी में प्रसन्न हैं कि विवाह निर्विघ्न सम्पन्न हो गया एवं विवाह में सम्मिलित सभी लोग 15 दिन बाद भी स्वस्थ हैं।

Monday, June 15, 2020

तर्क से परे-पुनर्जन्म


   मैं नहीं जानती कि पुनर्जन्म होता है या नहीं।पता नहीं हमारे पिछले जन्म के कर्म हमारे इस जन्म को कितना प्रभावित करते हैं या इस जन्म के कर्मों का क्या प्रतिफल होगा।कहते हैं कि मृत्यु के समय जो मनःस्थिति होती है या जो प्रबल इच्छा उस वक्त मन में होती है उसी के अनुसार अगला जन्म मिलता है।खैर, जिस बात की जानकारी नहीं उसके बारे में क्या विश्लेषण करना।
   मैं फिलहाल जिस घटना का ज़िक्र कर रही हूं, वह मात्र मेरा अनुभव एवं विश्वास है।
   6 जुलाई की वह मनहूस रात्रि।लगभग 10 बजे रात में मेरे मोबाइल पर अनजान नम्बर से फोन आता है।दूसरी बार रिंग करने पर मैं हमेशा कॉल ले लेती हूं।फोन करने वाले ने पूछा कि आप प्रशांत नायक की दीदी बोल रही हैं क्या?पता नहीं क्यों किसी अनहोनी की आशंका से दिल घबरा उठा।मैंने कांपती आवाज में पूछा कि आप कौन एवं कहाँ से बोल रहे हैं?
   जबाब मिला कि मैं उसका दोस्त मेरठ से बोल रहा हूँ, प्रशांत का एक्सीडेंट हो गया है।मैंने घबरा कर पूछा कि वह कैसा है।जबाब मिला कि उसकी हालत गंभीर है आप तुरंत आ जाइए।
   मेरे पति ने मुझसे फोन लेकर उससे विस्तृत जानकारी ली।जैसे तैसे हमने थोड़े पैसे एकत्रित किए,हमारे मकान मालिक के बेटे ने तुरंत अपनी कार निकाल ली,और आधे घंटे में हम निकल पड़े।अभी चौराहे तक ही पहुंचे थे कि उसकी मौत की भयानक खबर ने हमें दुःख के सागर में डूबा दिया।25 वर्ष की अल्पायु में वह हमसे दूर हो गया।प्रशांत मेरा दूसरा छोटा भाई था।अपने सात साल के बेटे को उसके चाचा जी के पास छोड़कर हम मेरठ के लिए निकल पड़े।रास्ते में मेरे पति ने मेरे बड़े भाई को जो मेरे बाद का है,तीनों बहनों एवं कुछ रिश्तेदरों को फोन किया।मम्मी पापा को केवल दुर्घटना की खबर दी।तीसरे नंबर की बहन जो प्रशांत के साथ ट्विन्स थी, बंगलौर में थी,वह भी दोपहर तक मेरठ आ गई अपने पति के साथ, जिसका विवाह अभी 6 माह पूर्व ही हुआ था।तमाम औपचारिकताओं को मेरे पति ने प्रशांत के मित्रों की सहायता से पूर्ण किया।हम दोनों बहनें तो बदहवास थीं।तीसरे दिन हम गोरखपुर पहुंचे।रिश्तेदारों के पहुंच जाने के कारण सुबह तक मां पिता को भी पता चल चुका था, वे तो संज्ञाशून्य हो चुके थे।होनी के समक्ष मानव विवश होता है।क्रिया कर्म की समस्त औपचारिकताएं पूरी होने के पश्चात सभी लोग चले गए।तेरहवीं के बाद मम्मी पापा को बिलखते छोड़कर टूटे हृदय के साथ हम भाई बहनों को भी अपने अपने कार्य स्थल को लौटना पड़ा।
   जीवन अपनी गति से प्रवाहमान था।हम मां-बहनें अक्सर प्रशांत को स्वप्न में देखा करते थे।मैं जब भी सपने में देखती, यही देखती कि उसकी मृत्यु हो चुकी है और उसकी आत्मा हमसे मिलने आई है।हम सब उससे अटैच्ड भी अत्यधिक थे।उसके मित्रों ने बताया था कि वह आखरी समय में भी होश में था एवं डॉक्टरों से विनती कर रहा था कि मुझे बचा लीजिए डॉक्टर, मुझपर बहुत जिम्मेदारी है।
   पता नहीं सच क्या है, लेकिन कहते हैं कि मृत्यु के समय जैसी प्रबल भावना होती है, यदि सम्भावना होती है तो आत्मा उसी घर में पुनर्जन्म लेती है।
   मेरे सपनों का मेरा अपना विश्लेषण है जो मैंने अपने अनुभवों से निकाला है।मैं जब भी स्वप्न में अपना विवाह देखती हूँ तो मुझे जल्दी ही कहीं से विवाह का शुभ समाचार प्राप्त होता है।यदि सपने में अपनी डिलीवरी ,प्रेग्नेंसी देखती हूं तो बच्चों की खुशखबरी सुनती हूं, चाहे परिचितों से या रिश्तेदारों से।
   समय अपनी गति से चलता रहा।नवम्बर के प्रथम सप्ताह की एक रात मैंने सपने में पुनः प्रशांत को देखा, मैंने उससे कहा कि तुम भटक क्यों रहे हो, प्रीति के यहां(उसकी जुड़वां) पैदा क्यों नहीं हो जाते।सुबह मैंने पति से जिक्र भी किया।उन्होंने कहा कि तुम सभी अभी सदमें में हो इसलिए ऐसे सपने देखते रहते हो।एक दो दिनों में मां-बहनों से बात करने पर पता चला कि उस रात्रि सभी ने सपने में उसे देखा था।20-25 दिन बाद मैंने फिर सपना देखा कि मेरे बेटा हुआ है।सुबह उठते ही मैंने पति को यह बात बताई।अभी आधे घंटे ही बीते थे कि प्रीति का फोन आया, मैंने हैलो बोलते ही कहा कि खुशखबरी सुना रही हो न,वह चौक पड़ी कि आपको कैसे पता।मैंने उसे सपने वाली बात बताई।उसने कहा कि आप सही कह रही हैं, मैंने अभी प्रेग्नेंसी टेस्ट किया है, पॉजिटिव रिपोर्ट आई है।खैर, दुःख से निकलने के लिए खुशी की एक किरण भी काफी होती है।
यथा समय उसे पुत्र की प्राप्ति हुई।हम सब उसे प्रशांत का पुनर्जन्म ही मानते हैं।प्रीति एवं छोटी बहन तो बाकायदा उसे राखी भी बांधती हैं।हालांकि मेरा मानना है कि वर्तमान के रिश्ते को ही देखना चाहिए।सब विश्वास की बातें हैं अपनी अपनी।

Saturday, June 13, 2020

मेरी बेटी


मेरी बेटी,
नाजुक,मासूम, नन्ही परी,
सीपी के मोती सी
चाहती हूं छिपाकर रखूं आँचल में
हमेशा हर दुःख से दूर,
पर करूँगी परवरिश कुछ यूँ,
बनाऊँगी अभेद्य चट्टान सी,
नहीं बनना तुम्हें सजावटी फूल,
बिखेरना है खुशबू चहुँ ओर,
नहीं बनना कैदी स्वर्ण पिंजरे का,
उड़ना है उन्मुक्त आकाश में,
जीतना है जिंदगी का हर रण,
करना अवश्य हर कर्तव्य पूर्ण,
पर नहीं होने देना स्व शोषण,
पाना है सर्वोच्च लक्ष्य,
भरना अपने सपनों में इंद्रधनुषी रंग,
अपनी कहानी की हर इबारत
लिखना अपनी मर्जी से,
और देना सुखद,सुंदर, सुखान्त,
चमकना पूर्णिमा के चन्द्र सा
कुछ यूँ कि मेरा परिचय,
मेरी पहचान हो मेरी बेटी।
          मेरी बेटी।।


Wednesday, June 10, 2020

एक प्रेम ऐसा भी

हमारे समाज में प्रेम को सदैव दैहिक स्तर पर मापा जाता है।मानसिक प्रेम को केवल कपोल कल्पना माना जाता है।वैसे देखा जाय तो ज्यादा गलत भी नहीं है यह सोच क्योंकि ऐसा होता भी बिरले ही है।हालांकि आज के भौतिक युग में जहां भावनाओं का विशेष मोल है भी नहीं, वहां ऐसा दृष्टांत मिलना असम्भव सा ही है।पर मैंने अपने जीवन में इसका अनुभव किया है हालांकि मैं जानता हूँ कि लोग इसके बारे में सही तो नहीं सोचने वाले, इसलिए मैंने अपने इस मन की भावना को अपने हृदय के सीप में मोती के समान छिपाकर रख लिया है।
   मैं एक प्यारी सी, प्रेम करने वाली पत्नी का पति,एक मासूम सी बेटी का पिता, एक अच्छे जॉब वाला सुखी गृहस्थ हूँ,जिसे अपने परिवार से बेहद प्रेम है एवं मैं उनका हर तरह से पूर्ण ध्यान रखता हूँ।
   एक दिन ऑफिस से आने के उपरांत मैं अपनी पत्नी के साथ बालकनी में बैठकर चाय पी रहा था कि सामने वाले फ्लैट की बालकनी में किताब पढ़ती हुई एक भद्र महिला पर मेरी निगाह पड़ी।मैंने यूं ही पत्नी से पूछ लिया कि शायद सामने वाले फ्लैट में नए लोग आए हैं।पता चला कि अभी कुछ दिन पूर्व ही शिफ्ट हुए हैं।बड़े शहरों में लोग  एक दूसरे के बारे में ज्यादा जानने के इक्षुक भी नहीं रहते।मेरी पत्नी को शाम की चाय बालकनी में पीने का शौक है,अतः रोज शाम को वे अपनी किताबों के साथ दिख जाती थीं।वे उम्र में मुझसे लगभग 6-7 वर्ष बड़ी होंगी।एक सामान्य सी उत्सुकता जाग्रत हुई कि परिवार में कौन कौन है क्योंकि इस एक माह में और कोई दिखाई नहीं दिया।
   एक छुट्टी के दिन मैं अपनी बेटी के साथ सोसायटी के पार्क में टहल रहा था कि मैंने उनको एक बेंच पर किताब के साथ बैठे देखा।ये तो समझ में आ गया था कि उन्हें पढ़ने का बेहद शौक है।चूंकि मैं उनसे उम्र में छोटा था अतः बेहिचक उनसे बात करने के उद्देश्य से उनके पास जाकर अपना परिचय दिया।उन्होंने भी मुस्कुरा कर जबाब दिया कि मैं आपको आपकी पत्नी के साथ रोज चाय पीते देखती हूँ।इस समय पार्क में बैठकर लोगों का अवलोकन करती हूं क्योंकि मैं एक लेखिका हूं।अब हर शनिवार, रविवार को उनसे मुलाकात हो जाती क्योंकि छुट्टी के दिन बेटी को पार्क में ले जाने की जिम्मेदारी मेरी थी।उनसे बात चीत होने लगी।उनकी बौद्धिक क्षमता से मैं बेहद प्रभावित था साहित्य पर चर्चा, लोगों की भावनाओं की बारीक विवेचना का मैं कायल हो गया था।सच कहूं तो उनकी वाणी एवं बुद्धिमत्ता के आकर्षण में मैं पूर्णतया बंध चुका था।जिस दिन उनसे मुलाकात नहीं होती कहीं कुछ खालीपन सा प्रतीत होने लगता।।अब परिचय मित्रता की सीमा में प्रवेश कर चुकी थी, अतः एक दिन परिवार के बारे में पूछ लिया।
   उन्होंने बताया कि उन्हें विवाह में रुचि नहीं थी इसलिए उन्होंने अविवाहित रहने का निर्णय ले लिया था।एक अनाथ लड़की को गोद ले लिया है, बेटी इस समय हॉस्टल में रहकर अपनी पढ़ाई पूरी कर रही है।
   हमारी इस मित्रता का मेरी पत्नी को भी पता था।कभी कभी वे घर भी आने लगीं थीं।परन्तु मेरी पत्नी को इस साहित्य चर्चा में रुचि न होने के कारण वह थोड़ी देर में उठ जाती थी।कभी कभी उनकी बातों से ऐसा प्रतीत होता था कि उनके मन में भी मेरे लिए कुछ कोमल भाव प्रस्फुटित हो गए हैं।यदि कुछ दिन नहीं मिल पाता था कार्य की व्यस्तता के कारण तो वे साधिकार कारण पूछ लेती थीं।
   हमारी मित्रता को दो वर्ष से ऊपर हो गए थे।एक बार उनकी तबीयत काफी खराब हो गई थी तो मैंने अपनी पत्नी के साथ उनका पूरा ध्यान रखा था।जब मेरी दूसरी सन्तान ने जन्म लिया तो उन्होंने मेरी पत्नी का ख्याल अपनी छोटी बहन की तरह रखा।
   मैं स्वीकार करता हूँ कि मेरी भावनाएं उनके लिए मात्र मित्र वाली तो नहीं थीं, किन्तु वासना तो लेश मात्र भी नहीं था।ऐसा प्रतीत होता था हम एक दूसरे के मानसिक भावों को परिपूर्ण कर रहे थे।उनकी दृष्टि में कभी मीरा सा प्रेम दिखता,कभी यशोदा सा वात्सल्य, कभी मित्रवत स्नेह।मैं अक्सर भ्रमित हो जाता।लेकिन हमारा रिश्ता बेहद पवित्र था अतः इस प्रेम को कोई नाम देने की आवश्यकता ही नहीं थी।वर्षों गुजर गए।आज उनकी बेटी का विवाह है।सारी जिम्मेदारी मैंने एवं मेरी पत्नी ने संभाल रखी थीं।
  मेरे बच्चे उन्हें ताई जी कह कर बुलाते हैं।कई रिश्ते बेनाम ही रह जाएं तो अच्छा है।हमारा मानसिक प्रेम हमारी ताकत है कमजोरी नहीं।बस हमें हमारी सीमाओँ का भान रहना चाहिए।

Tuesday, June 2, 2020

तलाक के बाद

तुम तो दामन झटककर आगे बढ़ गए,
मैं आज भी वहीं ख़ड़ी हूं
अपने सपनों के कब्रिस्तान में
अपनी टूटी ख्वाहिशों के मज़ार पर,
आँखों में आँसू भरे सोचती हूँ
क्या मेरी खता थी तुम्हें प्यार करना,
तुम पर आँख मूंदकर यकीन करना,
मैंने अपना जीवन लगा दिया
तुम्हारे घर को सँवारने में,
तुम्हारे रिश्तों को संभालने में,
तुमने जरा देर में खत्म कर दिया
हमारा रिश्ता, मेरा वजूद,
पुरानी यादों की लाश को दफनाकर
अब हिम्मत जुटाकर मुझे उठना है,
सम्भलना है और आगे बढ़ना है।

Friday, May 29, 2020

ऐसा क्यों

आज रवि का सुबह ही फोन आ गया था।वैसे तो लता जी नियम से हर शनिवार को बेटे को स्वयं फोन कर लेती थीं, बेटियों से तो लगभग रोज ही बात हो जाती थी।तबियत वगैरह पूछने के बाद रवि फोन रखते समय जब कहता कि मम्मी अपना ख्याल रखिएगा तो उसके शब्दों में छिपी पीड़ा और आर्द्रता वे बखूबी महसूस करती थीं, हंसकर कहतीं चिंता मत करो मैं बिल्कुल ठीक हूं, तुम भी अपना ध्यान रखना।
   यही रवि था, जब एक लड़की के पिता ने पूछ लिया था कि आपने अभी मकान नहीं बनवाया है तो रिटायरमेंट के बाद कहां रहेंगे तो नाराज होकर बोला था कि ये कोई पूछने की बात है, अपने बेटे के साथ रहेंगे और कहीं क्यों रहेंगे।
   रवि ने अपने लिए लड़की पसन्द करने की जिम्मेदारी मां को ही सौंप दिया था।लता जी ने पढ़ी लिखी एवं अच्छे परिवार की दीप्ति से बिना लेन देन के रवि का विवाह किया।समय बीतता रहा।कभी कभी रवि की बातों से लगता कि दीप्ति ससुराल पक्ष से सम्बंध नहीं रखना चाहती, परन्तु वे रवि को और खुद को भी समझा देतीं।
  रिटायरमेंट के बाद रवि के पिता जी ने बड़े शौक से मकान बनवाया परन्तु मात्र दो वर्ष बाद ही स्वर्ग सिधार गए।बेटे ने साथ चलने की जिद की परन्तु वे जाने को तैयार नहीं हुईं।डेढ़ साल बाद एक बार उनकी तबियत काफी खराब हो गई तब रवि अपने साथ ले गया।तभी चार पांच माह वे रहीं बेटे बहू के पास।आज भी उन दिनों की कड़वी यादें उनकी आंखों में आंसू ले आते हैं।
   रवि तो सुबह ऑफिस चला जाता, शाम7-8 बजे तक वापस आता।पूरे दिन में एक बार भी दीप्ति उन्हें देखने नहीं आती।खाना बनाने वाली खाना बना कर रख जाती, वे जैसे तैसे उठकर खाना ले लेतीं।वे शुगर की मरीज़ हैं, उन्हें बीच बीच में कुछ फल इत्यादि चाहिए होता था।दीप्ति को उनका किचन में जाना भी बर्दाश्त नहीं था।रवि जब पूछता कि फल दूध मम्मी को नियमित देती रहना तो हां कर देती, फिर उसके जाने के बाद मायके फोन कर उन्हें सुनाती कि उन्हें हर समय कुछ कहने खाने को चाहिए। बच्चों को भी उनके पास नहीं आने देती।अक्सर उनका शुगर लो हो जाता।रवि परेशान हो गया कि यहां आने के बाद मां इतनी कमजोर क्यों होती जा रही है।वे शिकायत कर बेटे की गृहस्थी में परेशानी नहीं पैदा करना चाहती थीं।
   उन्हें अपमानित करने का मौका निकालती रहती थी।एकबार मायके वाले आए हुए थे, कई पकवान बनवाए थे,परन्तु उन्हें बीमारी के नाम पर सुखी रोटी सब्जी दे दिया।एक बार तो हद ही हो गई।छोटे बच्चे ने कमरे में पानी गिरा दिया, उन्होंने पोछने को कहा तो अनसुना कर दिया।फिर वे पोंछा लाने के लिए जाने लगीं तो फ़िसल कर गिर गईं, वे वहीं बेहोश हो गईं।दोपहर में जब काम वाली लड़की आई तो उसने उन्हें सहारा देकर बिस्तर पर लिटाया।खैर जैसे तैसे ठीक होते ही उन्होंने वापस लौटने का फैसला कर लिया।और फिर हाथ पैर चलने तक अपने घर पर ही रहने का ठान लिया।साल दो साल में रवि अकेले आकर मिल जाता।पिछली बार आया था जाड़ों में अचानक तो वे आश्चर्य चकित रह गईं।एक दिन काफी अपसेट था तो पूछने पर फूट पड़ा कि आप क्या सोचती हैं कि आप नहीं बताती हैं तो मुझे दीप्ति के व्यवहार का पता नहीं है।मैं कितना दुर्भाग्यशाली हूं कि अपने माँ की सेवा नहीं कर सकता।लताजी स्वयं को अपराधी मानती हैं कि वे सही चुनाव नहीं कर सकीं।
   जिंदगी की कहानियां अजीब हैं, कहीं बहू, कहीं सास,नन्द,कहीं बेटा बेटी, पति पत्नी हर रिश्ते में कुछ न कुछ परेशानियां आती ही रहती हैं।ऐसा क्यों होता है।

Thursday, May 28, 2020

सौदा किस्मत का


दीप एवं अनीता का अरेंज मैरिज हुआ था।दीप के माता-पिता अपनी पसंद से अनीता को बहू बनाकर लाए थे, उसे अपने माँ पिता के पसंद पर पूर्ण विश्वास था।दीप भी अनीता के सौंदर्य एवं प्रेमपूर्ण व्यवहार से मन्त्र मुग्ध हो गया था।।वह अपने माँ पिता की इकलौती सन्तान था, उसे चिंता रहती थी कि कहीं उसकी पत्नी का सामंजस्य उसके माता पिता से न बैठ सका तो क्या होगा।लेकिन अनिता ने अपने मधुर व्यवहार से उनके हृदय में बेटी की जगह बना लिया।दीप अपने पिताजी के व्यवसाय को और अधिक उन्नति के पथ पर ले गया।ईश्वर की कृपा से घर में हर तरह से सुख-समृद्धि-शान्ति थी।
   पर समय सदैव एक समान नहीं रहता।दो वर्ष तो पंख लगाकर उड़ गए।अब सभी एक नन्हे मेहमान की प्रतीक्षा करने लगे थे।विलम्ब होते देख चिकित्सा के लिए डॉक्टर के पास जाने पर तमाम तरह की जांच होने पर पता चला कि अनीता के गर्भाशय में एक छोटा सा ट्यूमर है ट्यूमर कैंसरस नहीं था इसलिए चिंता की बात नहीं थी।दवाइयां प्रारंभ हो गईं।दीप ने अपने माता पिता से इस बात का ज़िक्र नहीं किया।इलाज चलते चलते डेढ़ वर्ष और बीत गए।अब दोनों के मन में निराशा घर करने लगी थी, ट्यूमर न घट रहा था, न बढ़ रहा था।इसी बीच अनीता प्रेग्नेंट हो गई डॉक्टर ने कहा कि यदि ट्यूमर का आकार न बढ़े तब तो कोई बात नहीं।नियमित चेकअप चलता रहा।
   लेकिन किस्मत के तो खेल ही निराले हैं, सब कुछ अच्छा चलते चलते ऐसी ठोकर दे देता है कि सम्भलना मुश्किल हो जाता है।बच्चे के साथ साथ चौथे माह से ट्यूमर का आकार भी बढ़ने लगा,कंचे के आकार से बढ़कर बेर के बराबर हो गया।हालांकि बच्चे का विकास सामान्य था।पांचवां महीना बीतते बीतते ट्यूमर सेब के बराबर हो गया।अब डॉ ने चिंता जताते हुए कहा कि ट्यूमर पर बढ़ते बच्चे का दबाव पड़ने से ट्यूमर के साइड वाली दीवार पतली हो गई है, अतः प्रेग्नेंसी आगे जारी रखना खतरनाक हो सकता है।
   अचानक उनकी खुशियां उनसे दूर जाती प्रतीत होने लगीं।अनीता किसी भी हालत में अपने बच्चे को खोना नहीं चाहती थी।दुखी तो दीप भी बहुत था परंतु अजन्मे बच्चे के मोह में वह अनीता को दावँ पर लगाने को हर्गिज तैयार नहीं था।दोनों को तनाव में देखकर मां पिता भी परेशान थे, परन्तु बार बार पूछने पर भी दीप-अनीता ने उन्हें कुछ नहीं बताया क्योंकि वे उन्हें दुःखी नहीं करना चाहते थे।देखते देखते छठा माह बीतने को आया।स्थिति की गम्भीरता को देखते हुए अब हर सप्ताह चेकअप होने लगा था।एक दिन अचानक अनीता के पेट में दर्द प्रारंभ हो गया।आनन फानन में अस्पताल ले जाया गया।चेकअप होने पर पता चला कि ट्यूमर वाली दीवार अत्यधिक पतली हो चुकी है एवं कभी भी फट सकती है।अब डॉ ने स्पष्ट कह दिया कि यदि अनीता की जान बचानी है तो तुरंत ऑपरेशन कर के बच्चे को निकालना होगा।अब दीप के माता पिता को भी सारी बात पता चली, वे दीप पर नाराज होने लगे कि उन्हें पहले सारी बात क्यों नहीं बताया गया।उन्होंने दृढ़ता से कहा कि उनके लिए अनीता की जिंदगी ज्यादा महत्वपूर्ण है, यह निर्णय लेने में इतना विलम्ब होना ही नहीं चाहिए था।
   खैर, ऑपरेशन कर बच्चे को इनक्यूबेटर में रखकर बचाने का प्रयास किया गया, परन्तु उसे बचाया नहीं जा सका।सभी बेहद दुखी थे, किन्तु किस्मत के आगे किसका वश चलता है।दीप ने किस्मत से सौदा कर अनिता को चुन लिया बच्चे के बदले में।
   अनीता को उस सदमें से उबरने में सबने हर सम्भव प्रयास किया।अनीता के पास असीम प्यार करने वाला परिवार था, पर गोद सूनी ही रह गई।
   अजीब है भाग्य का चलन,बहुत कुछ देकर भी एक ऐसी रिक्ति छोड़ देता है, जिसकी भरपाई किसी भी तरह नहीं हो पाती।


Tuesday, May 26, 2020

हमारे आसपास जिंदगी में तमाम कहानियां होती हैं, खट्टी मीठी, तीखी, कड़वी, अच्छी, बुरी।कुछ आपसे बांटना चाहती हूँ, कुछ मन में घुमड़ते भावों को कहना चाहती हूं।किसी को कुछ बुरा लगे तो क्षमाप्रार्थी हूँ।
   हर जिंदगी में इतनी कहानियां समाहित हैं कि एक उपन्यास बन जाए,बस उन्हें शब्दों में बांधने की कला आनी चाहिए, साहित्यकार यही तो करते हैं।मैं लेखिका नहीं एक आम गरी

Saturday, May 23, 2020

न्याय

   न्याय,
कभी घुटने टेक देता है धन के समक्ष,
कभी दबा दिया जाता है बाहुबली द्वारा,
कभी छिप जाता है झूठ के धुंध में,
कभी जकड़ जाता है कुटिल शब्द जाल में,
गरीब की पहुंच से सर्वदा सुदूर,
कभी सबूतों के अभाव में मजबूर,
न्याय की देवी खड़ी है कटघरे में,
आँखों में आँसू भरे,पट्टी बांधकर।।

Thursday, May 21, 2020

मेरी खामोशी

खामोशी गुनगुनाती है, मुस्कराती है,
दुःख में संग आँसू भी बहाती है,
यादों की गलियों में विचरती हूँ,
मन के भावों को शब्दों में संजोती हूँ,
न बातें बनने-बिगड़ने का डर,
न अकेलेपन से उपजे अवसाद का ख़ौफ़,
शोर से दूर सुकून के पल बिताती हूँ,
भूल चुकी थी ,स्वयं को तलाशती हूँ,
मेरे साथ मेरी खामोशी खिलखिलाती है।
मेरी खामोशी गुनगुनाती है, मुस्कराती है।।
                     मेरी खामोशी।।