Sunday, June 28, 2020

युवा

तुम युवा भविष्य राष्ट्र के हो,
तुम्हारी असीम ऊर्जा करेगी
देश को उन्नति पथ पर अग्रसर,
ले जाएगी सर्वोच्च शिखर पर,
हम भूतकाल हैं नीव के समान,
समग्र निर्माण तुम्हारे कांधे पर,
पहचानो स्वयं की क्षमता को,
मत करो व्यर्थ अपना जीवन,
किसी भी दुर्व्यसन में,
मत लगा दो दावँ पर खुद को,
किसी असफलता के अवसाद में,
तुम अनमोल हो हमारे लिए,
जुट जाओ लक्ष्य प्राप्ति में,
बनकर स्वर्णिम हस्ताक्षर
चमको सूर्य की तरह विश्वाकाश में।

Tuesday, June 23, 2020

साथ तुम्हारे

   वैसे देखा जाय तो यह एक सामान्य सी गाथा है, परन्तु असाधारण इस सन्दर्भ में है कि हमने शून्य से प्रारंभ कर आज जीवन में उस मुकाम को हासिल कर लिया है जिसके सपने एक आम मध्यमवर्गीय इंसान सदैव देखता है।
   यदि एक समझदार एवं हर हाल में साथ देने वाला साथी  साथ में हो तो जीवन के हर संघर्ष को विजित किया जा सकता है।
   मुझे अच्छी तरह याद है वह दिन जब तुमने अत्यंत सादगी से मुझसे विवाह करने की इच्छा जताई थी।हमारे मध्य कोई प्रेम प्रसंग तो था नहीं।मैं उस समय तृतीय वर्ष में अध्ययनरत थी, एक सामान्य रंग-रूप की,मध्यम कद-काठी की युवती,छह भाई-बहनों के मध्य तीसरे नंबर की।पिता सरकारी स्कूल में प्राध्यापक थे।हम सभी भाई-बहन पढ़ने में अच्छे एवं परिश्रमी थे।मेरा चयन बीएमएस में हो गया था।मैं अल्पभाषी एवं स्पष्टवादी थी, परिणामतः मैं कभी कभी लोगों को दम्भी प्रतीत होती थी, हालांकि मेरे मन में कभी भी किसी के प्रति कोई ईर्ष्या-द्वेष नहीं रहता था।मैं इधर उधर अनावश्यक समय व्यर्थ करना पसंद नहीं करती थी, अपनी शिक्षा पर ध्यान केंद्रित रखकर अपने काम से काम रखने वाली थी।मेरा सिद्धान्त था न काहू से दोस्ती न काहू से बैर।अत्यंत रूपवती तो थी नहीं कि लोग मुझसे प्रभावित हो, न मैं इसकी आकांक्षी थी।
   आप मुझसे दो साल सीनियर थे एवं मेरी ही तरह सामान्य तथा धीर गम्भीर व्यक्ति थे,इसपर हम समान जाति, शिक्षा के थे।अतः मैंने आपके प्रस्ताव को अपने परिवार के समक्ष प्रस्तुत किया।फिर दोनों परिवारों के मध्य परस्पर वार्तालाप होने के पश्चात एक अपेक्षाकृत सादे समारोह में हमारा विवाह सम्पन्न हो गया।हालांकि आपके परिवार के लोग थोड़े अप्रसन्न थे।विरोध का कोई विशेष कारण नहीं था, परन्तु उस समय अभी भी परिवार वालों को बेटे के विवाह को बिना लेन देन के वह भी उसकी पसंद की हुई कन्या के साथ करवाना नागवार होता था।
   खैर, मैं ससुराल आ गई किन्तु कुछ ही समय में हम दोनों समझ गए कि परिवार में हमारी स्थिति ग्राह्य नहीं है।,अतः मुझे लेकर आप एक कमरे के किराए के मकान में आ गए।अभी हम दोनों की शिक्षा पूर्ण होने में समय था और हमें किसी की सहायता लेना स्वीकार नहीं था, अतः हम दोनों ने कुछ छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना प्रारंभ कर दिया।हम दोनों ही अत्यंत परिश्रमी थे।धीरे धीरे समय गुज़रता रहा।मेरी पढ़ाई पूरी होते होते हमारा बेटा हमारे घर में आ गया।यह हमारे संघर्षों का सबसे मुश्किल दौर था।
   एक छोटे बच्चे की परवरिश, साथ में घर के काम उसपर कठिन पढ़ाई,अत्यधिक मुश्किल था, परन्तु तुम पग पग पर मेरे साथ थे।हम एक दूसरे के साथी ही नहीं थे बल्कि विश्वास एवं सम्बल भी थे।
तुम्हारे सहयोगी स्वभाव ने जिंदगी की तमाम मुश्किलें आसान कर दी थीं।
   आप ग्रेजुएशन पूरा होने के बाद एमडी के लिए प्रयत्नशील थे,तभी सौभाग्य से कई प्रदेशों में मेडिकल ऑफिसर की वेकेंसी निकली एवं एक जगह आपका चयन हो गया।मेरी भी ग्रेजुएशन पूरी हो गई थी अतः हम सब आपके कार्य स्थल पर शिफ्ट हो गए।एक वर्ष बाद सौभाग्य ने पुनः हमारा साथ दिया जिससे उसी प्रदेश में मैं भी मेडिकल ऑफिसर हो गई, हालांकि हमारे कार्य स्थल के मध्य दूरी काफी थी एवं बेटा भी स्कूल जाने लगा था परंतु हमारे आपसी सहयोग से हमने अपनी सभी कठिनाइयों को जीत लिया।थोड़े बड़े होने पर हमनें बेटे को हॉस्टल में भेज दिया क्योंकि हमारे कार्यस्थल पर शिक्षा की अच्छी व्यवस्था नहीं थी।
   जिंदगी अब पटरी पर आ गई थी।ट्यूशन पढ़ाते पढ़ाते हमारी इतनी प्रेक्टिस हो चुकी थी कि अतिरिक्त समय में हमनें कोचिंग प्रारंभ कर दिया जो अब अच्छी खासी प्रसिद्ध हो गई थी।फिर वहीं हमनें अपने सपनों के घर का भी निर्माण कर लिया।।
   बेटा अत्यंत कुशाग्र बुद्धि का था अतः इंटर के तुरंत पश्चात आइआइटी में उसका सेलेक्शन हो गया।हमारी पच्चीसवीं शादी की सालगिरह बेटे ने पूरे धूमधाम से उसी शहर में सेलेब्रेट किया जहां वह शिक्षा ग्रहण कर रहा था।स्नातक पूर्ण होते ही एक अच्छी कम्पनी में उसका कैम्पस सिलेक्शन हो गया जॉब के लिए।
   ईश्वर ने चाहा तो अतिशीघ्र हम उसका विवाह उसकी पसंद की युवती से सम्पन्न कर देंगे।
   सत्य है कि उपयुक्त एवं समझदार प्रेम पूर्ण साथी साथ हो तो जीवन के कठिन से कठिन डगर को भी अत्यंत सुगमता से पार किया जा सकता है।
          **********************************

Sunday, June 21, 2020

संदेश एक बेटे का

एक संदेश बेटे का पिता के नाम
**************************
     डियर पापा,
मैं जानता हूँ कि हमारे
मध्य तमाम मतभेद हैं,
आपको कई शिकायतें हैं
कि मैं अत्यधिक लापरवाह हूँ,
फोन नहीं करता समय से,
आनाकानी करता हूँ घर आने में,
मेरी दिनचर्चा से असहमत हैं आप,
आपको प्रतीत होता है कि
आप सबसे प्रेम कम है मुझे,
मुझे भी लगता है कि आपको
 विश्वास नहीं है मुझपर,
हमारे बीच अक्सर विवाद
हो जाता है किसी बात पर,
परन्तु यह अकाट्य सत्य है
कि हम दोनों के हृदय में
असीमित प्रेम है एक-दूसरे के लिए,
पर हम दोनों कृपण हैं
अभिव्यक्त नहीं करते कभी भी,
नहीं करते औपचारिक प्रदर्शन,
पर I LOVE YOU पापा-मां,
बस इतना विश्वास दिलाता हूँ
नहीं झुकेगा आपका शीष कभी भी
मेरे किसी अशोभनीय कृत्य से,
एक दिन आप गर्व से कहेंगे
कि देखो यह मेरा बेटा है।
     दिल से आपका बेटा
----------------------------------

,

Saturday, June 20, 2020

कैसा विकास

यह कैसी उन्नति, कैसा विकास,
हो रहा निरन्तर मानवीय संवेदनाओं का ह्रास,
कोई दुर्घटनाग्रस्त गिन रहा अंतिम श्वास,
लोग मदद की बजाय ले रहे तस्वीर
कहीं कर रहे किसी की बेबसी का उपहास,
कभी छुद्र स्वार्थवश खंडित करते हैं विश्वास,
हे मानव रखो हृदय में दया, प्रेम का वास,
ले जाएगा काल एक दिन बांध के यमपाश।

Thursday, June 18, 2020

श्रद्धांजलि

मेरी श्रद्धांजलि उन शहीदों को,
जो बलिदान हो गए देश की रक्षा में,
शत-शत नमन उनके परिजनों को
जिन्होंने अर्पित कर दिया जन्मभूमि पर
अपने पुत्र-पौत्र-भाई-पिता,
मेरे अश्रु उन पत्नियों के लिए
जिन्होंने न्यौछावर कर दिए
अपने सारे सपने, खुशियां,
अपनी जिंदगी के हर रंग
मातृभूमि पर सिंदूर के संग।

Wednesday, June 17, 2020

शुभ-विवाह

   मैं एक नवविवाहिता हूं, अभी 20 दिन पूर्व ही मेरा विवाह हुआ है।मैंने भी एक आम युवती की तरह सपने देख रखे थे अपने विवाह समारोह के, भव्य तो नहीं, परन्तु पूरे रस्म-रिवाज को निभाते, सखियों-रिश्तेदारों से घिरी, हंसी-ठिठोली के बीच।किन्तु आज के विषम परिस्थितियों के कारण तमाम सावधानियों के साथ गिनती के परिजनों के मध्य अत्यंत सादे आयोजन में विवाह संपन्न हो गया।
   याद आ रही है सात साल पहले बड़ी दीदी के विवाहोत्सव की। घर में प्रथम विवाह में छोटे भाई बहनों में उत्साह भी अत्यधिक होता है।एक माह पूर्व ही कपड़े एवं अन्य आवश्यक सामानों की खरीदारी प्रारम्भ हो गई थी।तीन चार दिन पहले ही रिश्तेदार घर में आ गए थे।रोज रात में ढोलक की थाप पर शगुन गीत गाए जाते थे।दो दिन पूर्व लेडीज संगीत में पूरे महल्ले की महिलाओं ने इकट्ठा होकर जबरदस्त महफ़िल जमा दिया था।उसी दिन भात पहनाने का कार्यक्रम भी सम्पन्न हुआ था।विवाह बेंक़वेट हॉल से था, सुबह से ही भागा दौड़ी शुरू हो गई थी।रात में दीदी ब्यूटी पार्लर से तैयार होकर आई थी एवं हम सब बहनों-सहेलियों ने पूरे साज श्रृंगार में, खूब चुहलबाजी करते हुए समारोह में शामिल हुए।रिवाल्विंग स्टेज पर जयमाला हुई।ढेर सारे बाराती-घराती ने दावत का आनन्द लिया।
   मेरे लिए वैसे तो 3-4 वर्ष से वर की खोज परिवार वाले कर रहे थे, परन्तु अब सुयोग बन पाया था।अब सभी लोग ज्यादा विलम्ब नहीं करना चाहते थे क्योंकि कोरोना समस्या से निकट भविष्य में निजात पाने की सम्भावना दिखाई नहीं दे रही थी।समारोह में मात्र 30 लोगों के शामिल होने की इजाजत प्रशासन ने प्रदान किया था।20 लोग वर पक्ष के एवं 10 कन्या पक्ष के आपसी सहमति से  निर्धारित कर लिया गया।
   विवाह से एक दिन पूर्व बड़ी छोटी बहनों एवं पड़ोस की एक दो आंटी की उपस्थिति में तेल-मेंहदी, शगुन, संगीत इत्यादि की औपचारिकताएं पूरी कर दी गई।
   विवाह वाले दिन घर की छत पर टेंट लगाकर लोगों के बैठने-खाने की व्यवस्था कर दी गई।मायके पक्ष के जो5-6 रिश्तेदार थे उन्होंने पहले ही खाने की मनाही कर दी थी।ससुराल लोकल में ही है, अतः बाराती घर से ही तैयार होकर 12 बजे तक आ गए।न द्वारचार, न बेंड,न नाच गाना, न रोशनी क्योंकि दिन की शादी थी।गेट पर ही सभी को सेनिटाइज कर छत पर पहुंचा दिया गया, सभी के चेहरों पर मास्क बंधे हुए थे।छत पर ही जयमाल का कार्यक्रम सम्पूर्ण हुआ।जयमाल के बाद फोटो खिंचवाने के लिए जरूर थोड़ी देर के लिए सबने मास्क हटा दिया था।उसके बाद बरातियों ने खाना खाया।फिर विवाह की रस्में पूरी करा दी गईं।मेकअप भी बहनों ने ही कर दिया था।फिर देर शाम को हल्का फुल्का नाश्ता करके बारात एवं मैं विदा हो गई।
   ससुराल पहुंचते रात हो गई थी अतः मुंहदिखाई एवं अन्य रस्मों की औपचारिकता दूसरे दिन होनी थी।खैर गिनती के ही रिश्तेदार ससुराल में भी थे,दूसरे दिन शीघ्र ही समस्त कार्यक्रम पूर्ण हो गए।इस समय तो हनीमून पर जाने का तो प्रश्न ही नहीं था।5-6 दिन बाद ही मुझे पति के साथ भेज दिया गया।
   खैर, भविष्य के लिए हम योजनाएं तो बनाते ही हैं, उसमें क्या पूर्ण होता है क्या अधूरा रह जाता है, समय के हाथ में है, यही जिंदगी है।हम सब इसी में प्रसन्न हैं कि विवाह निर्विघ्न सम्पन्न हो गया एवं विवाह में सम्मिलित सभी लोग 15 दिन बाद भी स्वस्थ हैं।

Monday, June 15, 2020

तर्क से परे-पुनर्जन्म


   मैं नहीं जानती कि पुनर्जन्म होता है या नहीं।पता नहीं हमारे पिछले जन्म के कर्म हमारे इस जन्म को कितना प्रभावित करते हैं या इस जन्म के कर्मों का क्या प्रतिफल होगा।कहते हैं कि मृत्यु के समय जो मनःस्थिति होती है या जो प्रबल इच्छा उस वक्त मन में होती है उसी के अनुसार अगला जन्म मिलता है।खैर, जिस बात की जानकारी नहीं उसके बारे में क्या विश्लेषण करना।
   मैं फिलहाल जिस घटना का ज़िक्र कर रही हूं, वह मात्र मेरा अनुभव एवं विश्वास है।
   6 जुलाई की वह मनहूस रात्रि।लगभग 10 बजे रात में मेरे मोबाइल पर अनजान नम्बर से फोन आता है।दूसरी बार रिंग करने पर मैं हमेशा कॉल ले लेती हूं।फोन करने वाले ने पूछा कि आप प्रशांत नायक की दीदी बोल रही हैं क्या?पता नहीं क्यों किसी अनहोनी की आशंका से दिल घबरा उठा।मैंने कांपती आवाज में पूछा कि आप कौन एवं कहाँ से बोल रहे हैं?
   जबाब मिला कि मैं उसका दोस्त मेरठ से बोल रहा हूँ, प्रशांत का एक्सीडेंट हो गया है।मैंने घबरा कर पूछा कि वह कैसा है।जबाब मिला कि उसकी हालत गंभीर है आप तुरंत आ जाइए।
   मेरे पति ने मुझसे फोन लेकर उससे विस्तृत जानकारी ली।जैसे तैसे हमने थोड़े पैसे एकत्रित किए,हमारे मकान मालिक के बेटे ने तुरंत अपनी कार निकाल ली,और आधे घंटे में हम निकल पड़े।अभी चौराहे तक ही पहुंचे थे कि उसकी मौत की भयानक खबर ने हमें दुःख के सागर में डूबा दिया।25 वर्ष की अल्पायु में वह हमसे दूर हो गया।प्रशांत मेरा दूसरा छोटा भाई था।अपने सात साल के बेटे को उसके चाचा जी के पास छोड़कर हम मेरठ के लिए निकल पड़े।रास्ते में मेरे पति ने मेरे बड़े भाई को जो मेरे बाद का है,तीनों बहनों एवं कुछ रिश्तेदरों को फोन किया।मम्मी पापा को केवल दुर्घटना की खबर दी।तीसरे नंबर की बहन जो प्रशांत के साथ ट्विन्स थी, बंगलौर में थी,वह भी दोपहर तक मेरठ आ गई अपने पति के साथ, जिसका विवाह अभी 6 माह पूर्व ही हुआ था।तमाम औपचारिकताओं को मेरे पति ने प्रशांत के मित्रों की सहायता से पूर्ण किया।हम दोनों बहनें तो बदहवास थीं।तीसरे दिन हम गोरखपुर पहुंचे।रिश्तेदारों के पहुंच जाने के कारण सुबह तक मां पिता को भी पता चल चुका था, वे तो संज्ञाशून्य हो चुके थे।होनी के समक्ष मानव विवश होता है।क्रिया कर्म की समस्त औपचारिकताएं पूरी होने के पश्चात सभी लोग चले गए।तेरहवीं के बाद मम्मी पापा को बिलखते छोड़कर टूटे हृदय के साथ हम भाई बहनों को भी अपने अपने कार्य स्थल को लौटना पड़ा।
   जीवन अपनी गति से प्रवाहमान था।हम मां-बहनें अक्सर प्रशांत को स्वप्न में देखा करते थे।मैं जब भी सपने में देखती, यही देखती कि उसकी मृत्यु हो चुकी है और उसकी आत्मा हमसे मिलने आई है।हम सब उससे अटैच्ड भी अत्यधिक थे।उसके मित्रों ने बताया था कि वह आखरी समय में भी होश में था एवं डॉक्टरों से विनती कर रहा था कि मुझे बचा लीजिए डॉक्टर, मुझपर बहुत जिम्मेदारी है।
   पता नहीं सच क्या है, लेकिन कहते हैं कि मृत्यु के समय जैसी प्रबल भावना होती है, यदि सम्भावना होती है तो आत्मा उसी घर में पुनर्जन्म लेती है।
   मेरे सपनों का मेरा अपना विश्लेषण है जो मैंने अपने अनुभवों से निकाला है।मैं जब भी स्वप्न में अपना विवाह देखती हूँ तो मुझे जल्दी ही कहीं से विवाह का शुभ समाचार प्राप्त होता है।यदि सपने में अपनी डिलीवरी ,प्रेग्नेंसी देखती हूं तो बच्चों की खुशखबरी सुनती हूं, चाहे परिचितों से या रिश्तेदारों से।
   समय अपनी गति से चलता रहा।नवम्बर के प्रथम सप्ताह की एक रात मैंने सपने में पुनः प्रशांत को देखा, मैंने उससे कहा कि तुम भटक क्यों रहे हो, प्रीति के यहां(उसकी जुड़वां) पैदा क्यों नहीं हो जाते।सुबह मैंने पति से जिक्र भी किया।उन्होंने कहा कि तुम सभी अभी सदमें में हो इसलिए ऐसे सपने देखते रहते हो।एक दो दिनों में मां-बहनों से बात करने पर पता चला कि उस रात्रि सभी ने सपने में उसे देखा था।20-25 दिन बाद मैंने फिर सपना देखा कि मेरे बेटा हुआ है।सुबह उठते ही मैंने पति को यह बात बताई।अभी आधे घंटे ही बीते थे कि प्रीति का फोन आया, मैंने हैलो बोलते ही कहा कि खुशखबरी सुना रही हो न,वह चौक पड़ी कि आपको कैसे पता।मैंने उसे सपने वाली बात बताई।उसने कहा कि आप सही कह रही हैं, मैंने अभी प्रेग्नेंसी टेस्ट किया है, पॉजिटिव रिपोर्ट आई है।खैर, दुःख से निकलने के लिए खुशी की एक किरण भी काफी होती है।
यथा समय उसे पुत्र की प्राप्ति हुई।हम सब उसे प्रशांत का पुनर्जन्म ही मानते हैं।प्रीति एवं छोटी बहन तो बाकायदा उसे राखी भी बांधती हैं।हालांकि मेरा मानना है कि वर्तमान के रिश्ते को ही देखना चाहिए।सब विश्वास की बातें हैं अपनी अपनी।

Saturday, June 13, 2020

मेरी बेटी


मेरी बेटी,
नाजुक,मासूम, नन्ही परी,
सीपी के मोती सी
चाहती हूं छिपाकर रखूं आँचल में
हमेशा हर दुःख से दूर,
पर करूँगी परवरिश कुछ यूँ,
बनाऊँगी अभेद्य चट्टान सी,
नहीं बनना तुम्हें सजावटी फूल,
बिखेरना है खुशबू चहुँ ओर,
नहीं बनना कैदी स्वर्ण पिंजरे का,
उड़ना है उन्मुक्त आकाश में,
जीतना है जिंदगी का हर रण,
करना अवश्य हर कर्तव्य पूर्ण,
पर नहीं होने देना स्व शोषण,
पाना है सर्वोच्च लक्ष्य,
भरना अपने सपनों में इंद्रधनुषी रंग,
अपनी कहानी की हर इबारत
लिखना अपनी मर्जी से,
और देना सुखद,सुंदर, सुखान्त,
चमकना पूर्णिमा के चन्द्र सा
कुछ यूँ कि मेरा परिचय,
मेरी पहचान हो मेरी बेटी।
          मेरी बेटी।।


Wednesday, June 10, 2020

एक प्रेम ऐसा भी

हमारे समाज में प्रेम को सदैव दैहिक स्तर पर मापा जाता है।मानसिक प्रेम को केवल कपोल कल्पना माना जाता है।वैसे देखा जाय तो ज्यादा गलत भी नहीं है यह सोच क्योंकि ऐसा होता भी बिरले ही है।हालांकि आज के भौतिक युग में जहां भावनाओं का विशेष मोल है भी नहीं, वहां ऐसा दृष्टांत मिलना असम्भव सा ही है।पर मैंने अपने जीवन में इसका अनुभव किया है हालांकि मैं जानता हूँ कि लोग इसके बारे में सही तो नहीं सोचने वाले, इसलिए मैंने अपने इस मन की भावना को अपने हृदय के सीप में मोती के समान छिपाकर रख लिया है।
   मैं एक प्यारी सी, प्रेम करने वाली पत्नी का पति,एक मासूम सी बेटी का पिता, एक अच्छे जॉब वाला सुखी गृहस्थ हूँ,जिसे अपने परिवार से बेहद प्रेम है एवं मैं उनका हर तरह से पूर्ण ध्यान रखता हूँ।
   एक दिन ऑफिस से आने के उपरांत मैं अपनी पत्नी के साथ बालकनी में बैठकर चाय पी रहा था कि सामने वाले फ्लैट की बालकनी में किताब पढ़ती हुई एक भद्र महिला पर मेरी निगाह पड़ी।मैंने यूं ही पत्नी से पूछ लिया कि शायद सामने वाले फ्लैट में नए लोग आए हैं।पता चला कि अभी कुछ दिन पूर्व ही शिफ्ट हुए हैं।बड़े शहरों में लोग  एक दूसरे के बारे में ज्यादा जानने के इक्षुक भी नहीं रहते।मेरी पत्नी को शाम की चाय बालकनी में पीने का शौक है,अतः रोज शाम को वे अपनी किताबों के साथ दिख जाती थीं।वे उम्र में मुझसे लगभग 6-7 वर्ष बड़ी होंगी।एक सामान्य सी उत्सुकता जाग्रत हुई कि परिवार में कौन कौन है क्योंकि इस एक माह में और कोई दिखाई नहीं दिया।
   एक छुट्टी के दिन मैं अपनी बेटी के साथ सोसायटी के पार्क में टहल रहा था कि मैंने उनको एक बेंच पर किताब के साथ बैठे देखा।ये तो समझ में आ गया था कि उन्हें पढ़ने का बेहद शौक है।चूंकि मैं उनसे उम्र में छोटा था अतः बेहिचक उनसे बात करने के उद्देश्य से उनके पास जाकर अपना परिचय दिया।उन्होंने भी मुस्कुरा कर जबाब दिया कि मैं आपको आपकी पत्नी के साथ रोज चाय पीते देखती हूँ।इस समय पार्क में बैठकर लोगों का अवलोकन करती हूं क्योंकि मैं एक लेखिका हूं।अब हर शनिवार, रविवार को उनसे मुलाकात हो जाती क्योंकि छुट्टी के दिन बेटी को पार्क में ले जाने की जिम्मेदारी मेरी थी।उनसे बात चीत होने लगी।उनकी बौद्धिक क्षमता से मैं बेहद प्रभावित था साहित्य पर चर्चा, लोगों की भावनाओं की बारीक विवेचना का मैं कायल हो गया था।सच कहूं तो उनकी वाणी एवं बुद्धिमत्ता के आकर्षण में मैं पूर्णतया बंध चुका था।जिस दिन उनसे मुलाकात नहीं होती कहीं कुछ खालीपन सा प्रतीत होने लगता।।अब परिचय मित्रता की सीमा में प्रवेश कर चुकी थी, अतः एक दिन परिवार के बारे में पूछ लिया।
   उन्होंने बताया कि उन्हें विवाह में रुचि नहीं थी इसलिए उन्होंने अविवाहित रहने का निर्णय ले लिया था।एक अनाथ लड़की को गोद ले लिया है, बेटी इस समय हॉस्टल में रहकर अपनी पढ़ाई पूरी कर रही है।
   हमारी इस मित्रता का मेरी पत्नी को भी पता था।कभी कभी वे घर भी आने लगीं थीं।परन्तु मेरी पत्नी को इस साहित्य चर्चा में रुचि न होने के कारण वह थोड़ी देर में उठ जाती थी।कभी कभी उनकी बातों से ऐसा प्रतीत होता था कि उनके मन में भी मेरे लिए कुछ कोमल भाव प्रस्फुटित हो गए हैं।यदि कुछ दिन नहीं मिल पाता था कार्य की व्यस्तता के कारण तो वे साधिकार कारण पूछ लेती थीं।
   हमारी मित्रता को दो वर्ष से ऊपर हो गए थे।एक बार उनकी तबीयत काफी खराब हो गई थी तो मैंने अपनी पत्नी के साथ उनका पूरा ध्यान रखा था।जब मेरी दूसरी सन्तान ने जन्म लिया तो उन्होंने मेरी पत्नी का ख्याल अपनी छोटी बहन की तरह रखा।
   मैं स्वीकार करता हूँ कि मेरी भावनाएं उनके लिए मात्र मित्र वाली तो नहीं थीं, किन्तु वासना तो लेश मात्र भी नहीं था।ऐसा प्रतीत होता था हम एक दूसरे के मानसिक भावों को परिपूर्ण कर रहे थे।उनकी दृष्टि में कभी मीरा सा प्रेम दिखता,कभी यशोदा सा वात्सल्य, कभी मित्रवत स्नेह।मैं अक्सर भ्रमित हो जाता।लेकिन हमारा रिश्ता बेहद पवित्र था अतः इस प्रेम को कोई नाम देने की आवश्यकता ही नहीं थी।वर्षों गुजर गए।आज उनकी बेटी का विवाह है।सारी जिम्मेदारी मैंने एवं मेरी पत्नी ने संभाल रखी थीं।
  मेरे बच्चे उन्हें ताई जी कह कर बुलाते हैं।कई रिश्ते बेनाम ही रह जाएं तो अच्छा है।हमारा मानसिक प्रेम हमारी ताकत है कमजोरी नहीं।बस हमें हमारी सीमाओँ का भान रहना चाहिए।

Tuesday, June 2, 2020

तलाक के बाद

तुम तो दामन झटककर आगे बढ़ गए,
मैं आज भी वहीं ख़ड़ी हूं
अपने सपनों के कब्रिस्तान में
अपनी टूटी ख्वाहिशों के मज़ार पर,
आँखों में आँसू भरे सोचती हूँ
क्या मेरी खता थी तुम्हें प्यार करना,
तुम पर आँख मूंदकर यकीन करना,
मैंने अपना जीवन लगा दिया
तुम्हारे घर को सँवारने में,
तुम्हारे रिश्तों को संभालने में,
तुमने जरा देर में खत्म कर दिया
हमारा रिश्ता, मेरा वजूद,
पुरानी यादों की लाश को दफनाकर
अब हिम्मत जुटाकर मुझे उठना है,
सम्भलना है और आगे बढ़ना है।