सही गलतकी परिभाषा भी समय, वय,परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तित होती रहती है एवं उनको समझाने, सिखाने का तरीका भी।जब बच्चे छोटे होते हैं तो हमें निर्णय लेकर बच्चों से उनका पालन करवाना होता है जो आसान होता है।तब मेरा बेटा नर्सरी में था, पास में ही स्कूल होने के कारण मैं पैदल ही लेकर आती थी।दुकानों पर विभिन्न वस्तुओं को देखकर बच्चे लेने की जिद तो करते ही हैं, मैने एक दिन छोड़कर 5 रु की वस्तु दिलाने का वादा कर रखा था।एक बार दूसरे दिन भी जिद करने लगा,वह रोता रहा किन्तु मैं घर ले आई बिना दिलाए।छोटी सी बात थी परंतु इच्छाओं पर नियंत्रण सीखना ही चाहिए, फिर बच्चों को यह पता होना चाहिये कि जिद सही बात के लिए होनी चाहिए।
सबसे मुश्किल होता है किशोरवय के बच्चों को कुछ समझाना क्योंकि इस दौर में तमाम शरीरिक ,हार्मोनल परिवर्तनों के कारण वे अत्यंत अस्थिर होते हैं, उनके ऊपर उनके दोस्तों का अत्यधिक प्रभाव होता है,माता पिता से विचारों में मतभेद प्रारम्भ हो जाता है, इसलिए हर बात पर वे टोकने पर विद्रोही होने लगते हैं, अतः उनकी बातों को ध्यान से सुन समझ कर धैर्य से उचित अनुचित समझाने की आवश्यकता होती है।
युवा होते बच्चों से मित्रवत व्यवहार की जरूरत होती है जिससे वे अपनी किसी भी समस्या को आसानी से डिस्कस कर सकें।युवा एवं पिछली पीढ़ी के मध्य अंतराल तो शाश्वत है, अतः हमें उनके दृषिटकोण को भी समझना होगा एव उन्हें हमारे अनुभवों से सीख लेना चाहिए।बहुत से लोग अपने बच्चों की तुलना स्वयं से तथा अन्य से करते रहते हैं यह उचित नहीं है।सदैव शक एवं अविश्वास उन्हें हमसे विलग कर देगा।
युवा बच्चों को निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र छोड़ देना चाहिए।, हां,हमें अपने विचार एक बार अवश्य व्यक्त करना चाहिए उचित तर्कों के साथ, हर पहलू पर एक स्वस्थ विचार विमर्श होना चाहिए।बड़ों के सभी निर्णय सही नहीं होते और बच्चों के सभी गलत नहीं हो सकते।कैरियर एवं विवाह मतभेद के दो अहम मुद्दे होते हैं जिनपर अत्यंत समझदारी से निर्णय लेने की आवश्यकता होती है क्योंकि यह जीवन प्रश्न होता है।अन्ततः एक ध्रुव सत्य, हमें सदैव मस्तिष्क का प्रयोग कर अच्छे के लिए
करते रहना चाहिए,परिणाम ईश्वर तथा समय के अधीन है।
शुभदिवस।
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