Saturday, July 25, 2020

Tark se pare-vah anubhav


तर्क से परे-वह अनुभव
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द्वितीय कथा
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     दो ध्रुव सत्य हैं संसार के, जीवन और मरण।आत्मा पंचतत्वों से निर्मित शरीर में प्रवेश कर माता के गर्भमाध्यम से इस नश्वर संसार मे अवतरित होती है, फिर जीवन काल पूर्ण कर इस शरीर को जीर्ण वस्त्र की भांति  त्यागकर  पुनः अगले जीवन चक्र में प्रवेश कर जाती है।
   वेद-पुराणों में वर्णित तमाम तथ्यों की विवेचना बुद्धि-सामर्थ्य मुझमें नहीं है, परन्तु जीवन में अनेकों ऐसी घटनाएं हमारे आसपास घटित होती हैं जो हमें सोचने पर विवश करती हैं कि कुछ तो ऐसा है जो तर्क से परे है।
   मेरे ससुर जी का देहांत मेरे विवाह से कई वर्ष पूर्व हो चुका था।वे अपने प्रथम पुत्र अर्थात मेरे पति के अत्यंत निकट थे, क्योंकि कई पुत्रियों के बाद उनका जन्म हुआ था।उस काल में लोगों के मन में शिद्दत से यह भावना स्थापित थी कि पुत्र के द्वारा किए गए तर्पण के बिना सद्गति प्राप्त होना असंभव है, और वंश संचालन पुत्र के द्वारा ही होता है।हालांकि आज भी ज्यादातर लोग इस मनोवृत्ति से उबर नहीं सके हैं।
   हमारे विवाह के लगभग दो साल बाद की बात है, उस रात्रि मैंने स्वप्न में अपने ससुर जी को देखा, चरणस्पर्श करने पर उन्होंने मुझे आशीष देते हुए कहा कि मैं तुम लोगों के पास आने वाला हूं।सुबह जब मैंने अपने पति से इस सपने का ज़िक्र किया तो उन्होंने हँस कर टाल दिया कि तुम न जाने क्या क्या देखती रहती हो
मैं बताती चलूं कि रात्रि शयन  में देखे हुए ज्यादातर स्वप्न जागने पर अच्छी तरह याद रहते हैं।कभी कभी तो नींद टूटने पर वही बाधित स्वप्न पुनः सोने पर फ़िल्म की तरह कंटीन्यू हो जाता है।
   हमारा बेडरूम नीचे था, नीचे ही मेरे पति की क्लीनिक थी,किचन, सासुमां एवं देवर का कमरा ऊपरी मंजिल पर था।किचन के कार्य से निबट कर दोपहर में 2-3 घण्टे आराम करने के लिए मैं अपने कमरे में चली आती थी।
   मुझे तीन माह की प्रेगनेंसी थी।गर्भावस्था के प्रारंभिक दिनों में तमाम परेशानियां इतनी अधिक होती हैं कि शरीरिक कमजोरी के साथ बेचैनी भी अत्यधिक रहती थी, अतः नींद तो आती नहीं थी, तो समय व्यतीत करने के लिए लेटे लेटे स्वयं के साथ ही कभी अंताक्षरी खेलती थी,कभी चालीसा का पाठ करती थी।
   वह 29 सितम्बर की दोपहरी थी।मैं कमरे में आंख बंद कर आराम कर रही थी।खिड़की से आती रोशनी से कमरे में विशेष अंधेरा नहीं था।मुझे ऐसा प्रतीत हुआ कि कमरे में कोई आया है, आँखे खोलकर देखा तो कोई नहीं था।मैंने सोचा कि मेरे पति आए होंगे।समय देखा तो 2.35 हो रहे थे।मैंने पुनः आंखे बन्दकर लिया।कुछ देर बाद मुझे पुनः किसी की उपस्थिति का आभास हुआ, इस बार भी कमरे में किसी को न पाकर मैंने बाहर निकल कर देखा कि शायद पति गोदाम में से दवा निकालने गए हों, जब उन्हें वहां भी नहीं पाया तो क्लीनिक में चली गयी, देखा तो वे ध्यानमग्न अपनी कुर्सी पर बैठे हुए हैं।मैंने उन्हें आवाज देकर बुलाया और सारी बात बताते हुए पूछा कि अभी आधा घंटे के अंदर आप आए थे क्या कमरे में।
   उन्होंने बताया कि वे तो लगभग दो घंटे से यहीं कुर्सी पर ही बैठे हुए हैं, फिर अंदर आकर सब जगह अच्छी तरह चेक किया।फिर मुझसे समय पूछा तो मैंने बताया कि 2.35 से 2.55 के बीच में  मुझे 2-3 बार ऐसा लगा कि कोई कमरे में आया है।पहले तो उन्होंने कहा कि तुम्हें झपकी आ गई होगी, जिससे तंद्रावस्था में तुम्हें भ्रम हुआ होगा।मैंने कहा कि मैंने हर बार समय देखा था।
   फिर उन्होंने मुझसे पूछा कि तुम्हें कुछ याद है कि आज तिथि कौन सी है।मेरे इनकार करने पर बताया कि आज ही के दिन दोपहर ही में इसी समय पिता जी का स्वर्गवास हुआ था।इसी कमरे में उनका शयनकक्ष था।उस दिन तो मेरे पति पूरी दोपहर मेरे साथ रहे, हालांकि फिर आगे मुझे कभी ऐसा कोई अनुभव नहीं हुआ।मुझे पूरा विश्वास था कि मुझे बेटा होगा क्योंकि मुझे अपने स्वप्न पर पूर्ण विश्वास था
   डिलीवरी तिथि के एक माह पूर्व मैं अपने मायके चली गयी।नियत समय पर सिजेरियन ऑपरेशन द्वारा मैंने एक अत्यंत स्वस्थ बालक को जन्म दिया, अत्यंत काले बाल थे उसके।
   नहीं जानती कि इन तथ्यों की क्या वास्तविकता है, किन्तु मान्यता यही है कि कभी कभी जीवात्मा मनोवांछित गर्भ की तलाश वर्षों तक करती रहती है।कुछ ऐसा ही विश्वास मेरा था कि मेरे ससुर जी ने ही अपने प्रिय बेटे के यहां पुत्र रूप में पदार्पण किया है।यह भी एक अद्भुत संयोग था कि मेरे बेटे को जैसे सोने से डर लगता था, जब उसे नींद आती थी तो बुरी तरह रोता था, मैं एवं मेरी माँ घबरा जाते थे कि न जाने उसे क्या तकलीफ है।उसकी यह स्थिति डेढ़ दो साल तक रही।मेरे ससुर जी सोते समय ही स्वर्ग सिधार गए थे, शाम को जब वे नहीं उठे तब पता चला था, जबकि पास में ही सासुमां पेपर पढ़ रही थीं।
   दूसरी बात तो बस यूं ही है।मैंने अपने दोनों विगत अनुभव अपनी मां को बता रखे थे।हॉस्पिटल से लौटने के 8-10 दिनों बाद एक दिन बेटे की मालिश मां कर रही थीं, मां ने हँसते हुए कहा कि क्यों समधी जी,समधिन से मालिश करवाना कैसा लग रहा है।बेटा खिलखिला कर हंस पड़ा।हमने प्रथम बार 10-12 दिन के बच्चे को इतनी जोर से खिलखिलाते हुए देखा था, सोते समय तो बच्चे अक्सर मुस्कुराते हैं।फिर 3-4बार मम्मी ने पुनः उक्त कथन को दोहराया, और बेटा हर बार जोरों से खिलखिला पड़ता था।फिर तो यह हमारा रोज का कार्य हो गया।न जाने यह क्या इत्तेफाक था कि और किसी बात पर न मुस्कुराए,परन्तु उस कथन पर अवश्य हंसता था।
   खैर, ईश्वर की अनन्त माया को वही जाने।हम तो साधारण मनुष्य मात्र हैं, उसके इशारों पर कठपुतली की तरह जीवन व्यतीत करते चले जाते हैं।
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   पुनः एक नई कथा के साथ उपस्थित होती हूं।
(प्रथम कथा था-पुनर्जन्म)


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