घुल गई है नफरत बहुत फिजाओं में,
चलो मिलकर सब प्रीत राग गाते हैं।
जिंदगी सहमी सी दुबकी हुई है कोनों में,
रौशनी करने को मिल दीप सब जलाते हैं।
जमीं पर आसमानी फ़रिश्ते नहीं उतरा करते,
बचाए जिंदगी वही मसीहा कहलाते हैं।
तनहा बैठे हुए हैं हम सब घरों में अपने,
खिड़की से झांक चलो हाल पूछ आते हैं।
हर चेहरे पर छाई हुई है मायूसी,
तमाम ख़ौफ़ को हिम्मत से हम मिटाते हैं।
खताएँ इतनी भी मत करो के मुआफ़ी न मिले,
गलती हद से बढ़े तो गुनाह ही कहलाते हैं।
चलो मिलकर सब प्रीत राग गाते हैं।
जिंदगी सहमी सी दुबकी हुई है कोनों में,
रौशनी करने को मिल दीप सब जलाते हैं।
जमीं पर आसमानी फ़रिश्ते नहीं उतरा करते,
बचाए जिंदगी वही मसीहा कहलाते हैं।
तनहा बैठे हुए हैं हम सब घरों में अपने,
खिड़की से झांक चलो हाल पूछ आते हैं।
हर चेहरे पर छाई हुई है मायूसी,
तमाम ख़ौफ़ को हिम्मत से हम मिटाते हैं।
खताएँ इतनी भी मत करो के मुआफ़ी न मिले,
गलती हद से बढ़े तो गुनाह ही कहलाते हैं।
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