Saturday, June 13, 2020

मेरी बेटी


मेरी बेटी,
नाजुक,मासूम, नन्ही परी,
सीपी के मोती सी
चाहती हूं छिपाकर रखूं आँचल में
हमेशा हर दुःख से दूर,
पर करूँगी परवरिश कुछ यूँ,
बनाऊँगी अभेद्य चट्टान सी,
नहीं बनना तुम्हें सजावटी फूल,
बिखेरना है खुशबू चहुँ ओर,
नहीं बनना कैदी स्वर्ण पिंजरे का,
उड़ना है उन्मुक्त आकाश में,
जीतना है जिंदगी का हर रण,
करना अवश्य हर कर्तव्य पूर्ण,
पर नहीं होने देना स्व शोषण,
पाना है सर्वोच्च लक्ष्य,
भरना अपने सपनों में इंद्रधनुषी रंग,
अपनी कहानी की हर इबारत
लिखना अपनी मर्जी से,
और देना सुखद,सुंदर, सुखान्त,
चमकना पूर्णिमा के चन्द्र सा
कुछ यूँ कि मेरा परिचय,
मेरी पहचान हो मेरी बेटी।
          मेरी बेटी।।


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