Tuesday, June 23, 2020

साथ तुम्हारे

   वैसे देखा जाय तो यह एक सामान्य सी गाथा है, परन्तु असाधारण इस सन्दर्भ में है कि हमने शून्य से प्रारंभ कर आज जीवन में उस मुकाम को हासिल कर लिया है जिसके सपने एक आम मध्यमवर्गीय इंसान सदैव देखता है।
   यदि एक समझदार एवं हर हाल में साथ देने वाला साथी  साथ में हो तो जीवन के हर संघर्ष को विजित किया जा सकता है।
   मुझे अच्छी तरह याद है वह दिन जब तुमने अत्यंत सादगी से मुझसे विवाह करने की इच्छा जताई थी।हमारे मध्य कोई प्रेम प्रसंग तो था नहीं।मैं उस समय तृतीय वर्ष में अध्ययनरत थी, एक सामान्य रंग-रूप की,मध्यम कद-काठी की युवती,छह भाई-बहनों के मध्य तीसरे नंबर की।पिता सरकारी स्कूल में प्राध्यापक थे।हम सभी भाई-बहन पढ़ने में अच्छे एवं परिश्रमी थे।मेरा चयन बीएमएस में हो गया था।मैं अल्पभाषी एवं स्पष्टवादी थी, परिणामतः मैं कभी कभी लोगों को दम्भी प्रतीत होती थी, हालांकि मेरे मन में कभी भी किसी के प्रति कोई ईर्ष्या-द्वेष नहीं रहता था।मैं इधर उधर अनावश्यक समय व्यर्थ करना पसंद नहीं करती थी, अपनी शिक्षा पर ध्यान केंद्रित रखकर अपने काम से काम रखने वाली थी।मेरा सिद्धान्त था न काहू से दोस्ती न काहू से बैर।अत्यंत रूपवती तो थी नहीं कि लोग मुझसे प्रभावित हो, न मैं इसकी आकांक्षी थी।
   आप मुझसे दो साल सीनियर थे एवं मेरी ही तरह सामान्य तथा धीर गम्भीर व्यक्ति थे,इसपर हम समान जाति, शिक्षा के थे।अतः मैंने आपके प्रस्ताव को अपने परिवार के समक्ष प्रस्तुत किया।फिर दोनों परिवारों के मध्य परस्पर वार्तालाप होने के पश्चात एक अपेक्षाकृत सादे समारोह में हमारा विवाह सम्पन्न हो गया।हालांकि आपके परिवार के लोग थोड़े अप्रसन्न थे।विरोध का कोई विशेष कारण नहीं था, परन्तु उस समय अभी भी परिवार वालों को बेटे के विवाह को बिना लेन देन के वह भी उसकी पसंद की हुई कन्या के साथ करवाना नागवार होता था।
   खैर, मैं ससुराल आ गई किन्तु कुछ ही समय में हम दोनों समझ गए कि परिवार में हमारी स्थिति ग्राह्य नहीं है।,अतः मुझे लेकर आप एक कमरे के किराए के मकान में आ गए।अभी हम दोनों की शिक्षा पूर्ण होने में समय था और हमें किसी की सहायता लेना स्वीकार नहीं था, अतः हम दोनों ने कुछ छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना प्रारंभ कर दिया।हम दोनों ही अत्यंत परिश्रमी थे।धीरे धीरे समय गुज़रता रहा।मेरी पढ़ाई पूरी होते होते हमारा बेटा हमारे घर में आ गया।यह हमारे संघर्षों का सबसे मुश्किल दौर था।
   एक छोटे बच्चे की परवरिश, साथ में घर के काम उसपर कठिन पढ़ाई,अत्यधिक मुश्किल था, परन्तु तुम पग पग पर मेरे साथ थे।हम एक दूसरे के साथी ही नहीं थे बल्कि विश्वास एवं सम्बल भी थे।
तुम्हारे सहयोगी स्वभाव ने जिंदगी की तमाम मुश्किलें आसान कर दी थीं।
   आप ग्रेजुएशन पूरा होने के बाद एमडी के लिए प्रयत्नशील थे,तभी सौभाग्य से कई प्रदेशों में मेडिकल ऑफिसर की वेकेंसी निकली एवं एक जगह आपका चयन हो गया।मेरी भी ग्रेजुएशन पूरी हो गई थी अतः हम सब आपके कार्य स्थल पर शिफ्ट हो गए।एक वर्ष बाद सौभाग्य ने पुनः हमारा साथ दिया जिससे उसी प्रदेश में मैं भी मेडिकल ऑफिसर हो गई, हालांकि हमारे कार्य स्थल के मध्य दूरी काफी थी एवं बेटा भी स्कूल जाने लगा था परंतु हमारे आपसी सहयोग से हमने अपनी सभी कठिनाइयों को जीत लिया।थोड़े बड़े होने पर हमनें बेटे को हॉस्टल में भेज दिया क्योंकि हमारे कार्यस्थल पर शिक्षा की अच्छी व्यवस्था नहीं थी।
   जिंदगी अब पटरी पर आ गई थी।ट्यूशन पढ़ाते पढ़ाते हमारी इतनी प्रेक्टिस हो चुकी थी कि अतिरिक्त समय में हमनें कोचिंग प्रारंभ कर दिया जो अब अच्छी खासी प्रसिद्ध हो गई थी।फिर वहीं हमनें अपने सपनों के घर का भी निर्माण कर लिया।।
   बेटा अत्यंत कुशाग्र बुद्धि का था अतः इंटर के तुरंत पश्चात आइआइटी में उसका सेलेक्शन हो गया।हमारी पच्चीसवीं शादी की सालगिरह बेटे ने पूरे धूमधाम से उसी शहर में सेलेब्रेट किया जहां वह शिक्षा ग्रहण कर रहा था।स्नातक पूर्ण होते ही एक अच्छी कम्पनी में उसका कैम्पस सिलेक्शन हो गया जॉब के लिए।
   ईश्वर ने चाहा तो अतिशीघ्र हम उसका विवाह उसकी पसंद की युवती से सम्पन्न कर देंगे।
   सत्य है कि उपयुक्त एवं समझदार प्रेम पूर्ण साथी साथ हो तो जीवन के कठिन से कठिन डगर को भी अत्यंत सुगमता से पार किया जा सकता है।
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