मैं एक नवविवाहिता हूं, अभी 20 दिन पूर्व ही मेरा विवाह हुआ है।मैंने भी एक आम युवती की तरह सपने देख रखे थे अपने विवाह समारोह के, भव्य तो नहीं, परन्तु पूरे रस्म-रिवाज को निभाते, सखियों-रिश्तेदारों से घिरी, हंसी-ठिठोली के बीच।किन्तु आज के विषम परिस्थितियों के कारण तमाम सावधानियों के साथ गिनती के परिजनों के मध्य अत्यंत सादे आयोजन में विवाह संपन्न हो गया।
याद आ रही है सात साल पहले बड़ी दीदी के विवाहोत्सव की। घर में प्रथम विवाह में छोटे भाई बहनों में उत्साह भी अत्यधिक होता है।एक माह पूर्व ही कपड़े एवं अन्य आवश्यक सामानों की खरीदारी प्रारम्भ हो गई थी।तीन चार दिन पहले ही रिश्तेदार घर में आ गए थे।रोज रात में ढोलक की थाप पर शगुन गीत गाए जाते थे।दो दिन पूर्व लेडीज संगीत में पूरे महल्ले की महिलाओं ने इकट्ठा होकर जबरदस्त महफ़िल जमा दिया था।उसी दिन भात पहनाने का कार्यक्रम भी सम्पन्न हुआ था।विवाह बेंक़वेट हॉल से था, सुबह से ही भागा दौड़ी शुरू हो गई थी।रात में दीदी ब्यूटी पार्लर से तैयार होकर आई थी एवं हम सब बहनों-सहेलियों ने पूरे साज श्रृंगार में, खूब चुहलबाजी करते हुए समारोह में शामिल हुए।रिवाल्विंग स्टेज पर जयमाला हुई।ढेर सारे बाराती-घराती ने दावत का आनन्द लिया।
मेरे लिए वैसे तो 3-4 वर्ष से वर की खोज परिवार वाले कर रहे थे, परन्तु अब सुयोग बन पाया था।अब सभी लोग ज्यादा विलम्ब नहीं करना चाहते थे क्योंकि कोरोना समस्या से निकट भविष्य में निजात पाने की सम्भावना दिखाई नहीं दे रही थी।समारोह में मात्र 30 लोगों के शामिल होने की इजाजत प्रशासन ने प्रदान किया था।20 लोग वर पक्ष के एवं 10 कन्या पक्ष के आपसी सहमति से निर्धारित कर लिया गया।
विवाह से एक दिन पूर्व बड़ी छोटी बहनों एवं पड़ोस की एक दो आंटी की उपस्थिति में तेल-मेंहदी, शगुन, संगीत इत्यादि की औपचारिकताएं पूरी कर दी गई।
विवाह वाले दिन घर की छत पर टेंट लगाकर लोगों के बैठने-खाने की व्यवस्था कर दी गई।मायके पक्ष के जो5-6 रिश्तेदार थे उन्होंने पहले ही खाने की मनाही कर दी थी।ससुराल लोकल में ही है, अतः बाराती घर से ही तैयार होकर 12 बजे तक आ गए।न द्वारचार, न बेंड,न नाच गाना, न रोशनी क्योंकि दिन की शादी थी।गेट पर ही सभी को सेनिटाइज कर छत पर पहुंचा दिया गया, सभी के चेहरों पर मास्क बंधे हुए थे।छत पर ही जयमाल का कार्यक्रम सम्पूर्ण हुआ।जयमाल के बाद फोटो खिंचवाने के लिए जरूर थोड़ी देर के लिए सबने मास्क हटा दिया था।उसके बाद बरातियों ने खाना खाया।फिर विवाह की रस्में पूरी करा दी गईं।मेकअप भी बहनों ने ही कर दिया था।फिर देर शाम को हल्का फुल्का नाश्ता करके बारात एवं मैं विदा हो गई।
ससुराल पहुंचते रात हो गई थी अतः मुंहदिखाई एवं अन्य रस्मों की औपचारिकता दूसरे दिन होनी थी।खैर गिनती के ही रिश्तेदार ससुराल में भी थे,दूसरे दिन शीघ्र ही समस्त कार्यक्रम पूर्ण हो गए।इस समय तो हनीमून पर जाने का तो प्रश्न ही नहीं था।5-6 दिन बाद ही मुझे पति के साथ भेज दिया गया।
खैर, भविष्य के लिए हम योजनाएं तो बनाते ही हैं, उसमें क्या पूर्ण होता है क्या अधूरा रह जाता है, समय के हाथ में है, यही जिंदगी है।हम सब इसी में प्रसन्न हैं कि विवाह निर्विघ्न सम्पन्न हो गया एवं विवाह में सम्मिलित सभी लोग 15 दिन बाद भी स्वस्थ हैं।
याद आ रही है सात साल पहले बड़ी दीदी के विवाहोत्सव की। घर में प्रथम विवाह में छोटे भाई बहनों में उत्साह भी अत्यधिक होता है।एक माह पूर्व ही कपड़े एवं अन्य आवश्यक सामानों की खरीदारी प्रारम्भ हो गई थी।तीन चार दिन पहले ही रिश्तेदार घर में आ गए थे।रोज रात में ढोलक की थाप पर शगुन गीत गाए जाते थे।दो दिन पूर्व लेडीज संगीत में पूरे महल्ले की महिलाओं ने इकट्ठा होकर जबरदस्त महफ़िल जमा दिया था।उसी दिन भात पहनाने का कार्यक्रम भी सम्पन्न हुआ था।विवाह बेंक़वेट हॉल से था, सुबह से ही भागा दौड़ी शुरू हो गई थी।रात में दीदी ब्यूटी पार्लर से तैयार होकर आई थी एवं हम सब बहनों-सहेलियों ने पूरे साज श्रृंगार में, खूब चुहलबाजी करते हुए समारोह में शामिल हुए।रिवाल्विंग स्टेज पर जयमाला हुई।ढेर सारे बाराती-घराती ने दावत का आनन्द लिया।
मेरे लिए वैसे तो 3-4 वर्ष से वर की खोज परिवार वाले कर रहे थे, परन्तु अब सुयोग बन पाया था।अब सभी लोग ज्यादा विलम्ब नहीं करना चाहते थे क्योंकि कोरोना समस्या से निकट भविष्य में निजात पाने की सम्भावना दिखाई नहीं दे रही थी।समारोह में मात्र 30 लोगों के शामिल होने की इजाजत प्रशासन ने प्रदान किया था।20 लोग वर पक्ष के एवं 10 कन्या पक्ष के आपसी सहमति से निर्धारित कर लिया गया।
विवाह से एक दिन पूर्व बड़ी छोटी बहनों एवं पड़ोस की एक दो आंटी की उपस्थिति में तेल-मेंहदी, शगुन, संगीत इत्यादि की औपचारिकताएं पूरी कर दी गई।
विवाह वाले दिन घर की छत पर टेंट लगाकर लोगों के बैठने-खाने की व्यवस्था कर दी गई।मायके पक्ष के जो5-6 रिश्तेदार थे उन्होंने पहले ही खाने की मनाही कर दी थी।ससुराल लोकल में ही है, अतः बाराती घर से ही तैयार होकर 12 बजे तक आ गए।न द्वारचार, न बेंड,न नाच गाना, न रोशनी क्योंकि दिन की शादी थी।गेट पर ही सभी को सेनिटाइज कर छत पर पहुंचा दिया गया, सभी के चेहरों पर मास्क बंधे हुए थे।छत पर ही जयमाल का कार्यक्रम सम्पूर्ण हुआ।जयमाल के बाद फोटो खिंचवाने के लिए जरूर थोड़ी देर के लिए सबने मास्क हटा दिया था।उसके बाद बरातियों ने खाना खाया।फिर विवाह की रस्में पूरी करा दी गईं।मेकअप भी बहनों ने ही कर दिया था।फिर देर शाम को हल्का फुल्का नाश्ता करके बारात एवं मैं विदा हो गई।
ससुराल पहुंचते रात हो गई थी अतः मुंहदिखाई एवं अन्य रस्मों की औपचारिकता दूसरे दिन होनी थी।खैर गिनती के ही रिश्तेदार ससुराल में भी थे,दूसरे दिन शीघ्र ही समस्त कार्यक्रम पूर्ण हो गए।इस समय तो हनीमून पर जाने का तो प्रश्न ही नहीं था।5-6 दिन बाद ही मुझे पति के साथ भेज दिया गया।
खैर, भविष्य के लिए हम योजनाएं तो बनाते ही हैं, उसमें क्या पूर्ण होता है क्या अधूरा रह जाता है, समय के हाथ में है, यही जिंदगी है।हम सब इसी में प्रसन्न हैं कि विवाह निर्विघ्न सम्पन्न हो गया एवं विवाह में सम्मिलित सभी लोग 15 दिन बाद भी स्वस्थ हैं।
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