Wednesday, June 10, 2020

एक प्रेम ऐसा भी

हमारे समाज में प्रेम को सदैव दैहिक स्तर पर मापा जाता है।मानसिक प्रेम को केवल कपोल कल्पना माना जाता है।वैसे देखा जाय तो ज्यादा गलत भी नहीं है यह सोच क्योंकि ऐसा होता भी बिरले ही है।हालांकि आज के भौतिक युग में जहां भावनाओं का विशेष मोल है भी नहीं, वहां ऐसा दृष्टांत मिलना असम्भव सा ही है।पर मैंने अपने जीवन में इसका अनुभव किया है हालांकि मैं जानता हूँ कि लोग इसके बारे में सही तो नहीं सोचने वाले, इसलिए मैंने अपने इस मन की भावना को अपने हृदय के सीप में मोती के समान छिपाकर रख लिया है।
   मैं एक प्यारी सी, प्रेम करने वाली पत्नी का पति,एक मासूम सी बेटी का पिता, एक अच्छे जॉब वाला सुखी गृहस्थ हूँ,जिसे अपने परिवार से बेहद प्रेम है एवं मैं उनका हर तरह से पूर्ण ध्यान रखता हूँ।
   एक दिन ऑफिस से आने के उपरांत मैं अपनी पत्नी के साथ बालकनी में बैठकर चाय पी रहा था कि सामने वाले फ्लैट की बालकनी में किताब पढ़ती हुई एक भद्र महिला पर मेरी निगाह पड़ी।मैंने यूं ही पत्नी से पूछ लिया कि शायद सामने वाले फ्लैट में नए लोग आए हैं।पता चला कि अभी कुछ दिन पूर्व ही शिफ्ट हुए हैं।बड़े शहरों में लोग  एक दूसरे के बारे में ज्यादा जानने के इक्षुक भी नहीं रहते।मेरी पत्नी को शाम की चाय बालकनी में पीने का शौक है,अतः रोज शाम को वे अपनी किताबों के साथ दिख जाती थीं।वे उम्र में मुझसे लगभग 6-7 वर्ष बड़ी होंगी।एक सामान्य सी उत्सुकता जाग्रत हुई कि परिवार में कौन कौन है क्योंकि इस एक माह में और कोई दिखाई नहीं दिया।
   एक छुट्टी के दिन मैं अपनी बेटी के साथ सोसायटी के पार्क में टहल रहा था कि मैंने उनको एक बेंच पर किताब के साथ बैठे देखा।ये तो समझ में आ गया था कि उन्हें पढ़ने का बेहद शौक है।चूंकि मैं उनसे उम्र में छोटा था अतः बेहिचक उनसे बात करने के उद्देश्य से उनके पास जाकर अपना परिचय दिया।उन्होंने भी मुस्कुरा कर जबाब दिया कि मैं आपको आपकी पत्नी के साथ रोज चाय पीते देखती हूँ।इस समय पार्क में बैठकर लोगों का अवलोकन करती हूं क्योंकि मैं एक लेखिका हूं।अब हर शनिवार, रविवार को उनसे मुलाकात हो जाती क्योंकि छुट्टी के दिन बेटी को पार्क में ले जाने की जिम्मेदारी मेरी थी।उनसे बात चीत होने लगी।उनकी बौद्धिक क्षमता से मैं बेहद प्रभावित था साहित्य पर चर्चा, लोगों की भावनाओं की बारीक विवेचना का मैं कायल हो गया था।सच कहूं तो उनकी वाणी एवं बुद्धिमत्ता के आकर्षण में मैं पूर्णतया बंध चुका था।जिस दिन उनसे मुलाकात नहीं होती कहीं कुछ खालीपन सा प्रतीत होने लगता।।अब परिचय मित्रता की सीमा में प्रवेश कर चुकी थी, अतः एक दिन परिवार के बारे में पूछ लिया।
   उन्होंने बताया कि उन्हें विवाह में रुचि नहीं थी इसलिए उन्होंने अविवाहित रहने का निर्णय ले लिया था।एक अनाथ लड़की को गोद ले लिया है, बेटी इस समय हॉस्टल में रहकर अपनी पढ़ाई पूरी कर रही है।
   हमारी इस मित्रता का मेरी पत्नी को भी पता था।कभी कभी वे घर भी आने लगीं थीं।परन्तु मेरी पत्नी को इस साहित्य चर्चा में रुचि न होने के कारण वह थोड़ी देर में उठ जाती थी।कभी कभी उनकी बातों से ऐसा प्रतीत होता था कि उनके मन में भी मेरे लिए कुछ कोमल भाव प्रस्फुटित हो गए हैं।यदि कुछ दिन नहीं मिल पाता था कार्य की व्यस्तता के कारण तो वे साधिकार कारण पूछ लेती थीं।
   हमारी मित्रता को दो वर्ष से ऊपर हो गए थे।एक बार उनकी तबीयत काफी खराब हो गई थी तो मैंने अपनी पत्नी के साथ उनका पूरा ध्यान रखा था।जब मेरी दूसरी सन्तान ने जन्म लिया तो उन्होंने मेरी पत्नी का ख्याल अपनी छोटी बहन की तरह रखा।
   मैं स्वीकार करता हूँ कि मेरी भावनाएं उनके लिए मात्र मित्र वाली तो नहीं थीं, किन्तु वासना तो लेश मात्र भी नहीं था।ऐसा प्रतीत होता था हम एक दूसरे के मानसिक भावों को परिपूर्ण कर रहे थे।उनकी दृष्टि में कभी मीरा सा प्रेम दिखता,कभी यशोदा सा वात्सल्य, कभी मित्रवत स्नेह।मैं अक्सर भ्रमित हो जाता।लेकिन हमारा रिश्ता बेहद पवित्र था अतः इस प्रेम को कोई नाम देने की आवश्यकता ही नहीं थी।वर्षों गुजर गए।आज उनकी बेटी का विवाह है।सारी जिम्मेदारी मैंने एवं मेरी पत्नी ने संभाल रखी थीं।
  मेरे बच्चे उन्हें ताई जी कह कर बुलाते हैं।कई रिश्ते बेनाम ही रह जाएं तो अच्छा है।हमारा मानसिक प्रेम हमारी ताकत है कमजोरी नहीं।बस हमें हमारी सीमाओँ का भान रहना चाहिए।

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